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Friday, June 1, 2012

फिर से अनुराग कश्‍यप

अनुराग से यह बातचीत उनके कान फिल्‍म फेस्विल जाने के पहले हुई थी। उस दिन वे बहुत व्‍यस्‍त थे। बड़ी मुश्किल से देश-विदेश के पत्रकारों से बातचीत और इंटरव्‍यू के बीच-बीच में मिले समय में यह साक्षात्‍कार हो पाया। इसका पहला अंश यहां दे रहा हूं। दूसरी कड़ी में आगे का अंश पोस्‍ट करूंगा। 


- कान में चार फिल्मों का चुना जाना बड़ी खबर है, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री ने अनसुना कर दिया। कोई हलचल ही नहीं है?
0 क्या कर सकते हैं। कुछ लोगों के व्यक्तिगत संदेश आए हैं। कुछ नहीं कह सकते। हमारी इंडस्ट्री ऐसी ही है। मेनस्ट्रीम की कोई फिल्म चुनी गई रहती तो बड़ी खबर बनती। इंडस्ट्री कभी हमारी कामयाबी को सेलिब्रेट नहीं करती।
- हर छोटी बात पर ट्विट की बाढ़ सी आ जाती है। इस बार वहां भी शून्य ब सन्नाटा छाया है?
0 उन्हें लगता होगा कि हम योग्य फिल्ममेकर नहीं हैं। ये कौन से लोग हैं, जिनकी फिल्में जा रही हैं? इनसे अच्छी फिल्में तो हम बनाते हैं। इंडस्ट्री का यह भी तो भावना है। इंडस्ट्री का एक ही मानना है कि मैं जो फिल्में बनाता हूं। वह बहुत ही डार्क और वाहियात होती हैं। उन्हें यह भी लगता होगा कि ऐसी फिल्में कैसे चुन ली गईं? समस्या यह है कि यहां के लोग फैशन के तहत कान जरूर जाते हैं, लेकिन जाकर वहां फिल्में नहीं देखते। ये नहीं देखते कि कैसी फिल्में बन रहीहैं? उन फिल्मों को देख लें तो फिर मेरी फिल्में कैंडीप्लॉस लगेगी।
- कान फिल्म फेस्टिवल कितना महत्वपूर्ण है?
0 सबसे पहले तो लोगों कोय ही नहीं मालूम कि फेस्टिवल का उद्देश्य क्या होता है? बहुत सामान्य उदाहरण दूं तो यह गांव का मेला है। मेले में हर तरह की चीजें बिकने आती हैं। फिल्म फेस्टिवल के मेले में फिल्में बेची जाती हैं। दिखाई जाती हैं। प्रदर्शित की जाती हैं। कान एक सांस्कृतिक बाजार की तरह है। एक स्थान है? फ्रांस के संस्कृति मंत्रालय से कान में ऐसे आयोजन की मंजूरी मिली हुई है। वहां हर तरह के फेस्टिवल होते हैं। फिल्म फेस्टिवल के बाद पोर्न फिल्म फेस्टिवल होता है। उसके बाद एड फिल्मों का, फिर टीवी का  ़ ़ ़ इस तरह सालो भर कोई न कोई फेस्टिवल चलता रहता है। कान की अर्थव्यवस्था फेस्टिवल पर निर्भर है। होटल, समुद्रतट, सैरगाह है। वेमोस में विएवाल है। विएनाव में हर समय फेस्टिवल चलते रहते हैं। कान में 1946 में एक बॉडी ने फिल्म फेस्टिवल शुरू की। तब कंपीटिशन होता था। फिर उन सर्टेवरिगार्ड चालू हुआ। पहले साल ही भारत की ‘नीचा नगर’ को पुरस्कार मिला था। फिर ‘उन सर्टैनरिगार्ड’ चालू हुआ, क्योंकि अलग ढंग और सोच की फिल्मों को कंपीटिशन में जगह नहीं मिलती थी। ‘अनसर्टेन रिगार्ड’ में मतलब ‘ए सर्टन पाइंट ऑफ व्यू’ यानि अलग दृष्टिकोण। 1966 में लोगों ने विद्रोह कर के डायरेक्टर्स फोर्टनाइट शुरू किया। तब गोरार सबसे आगे थे। फिर क्रिटिक वीक आरंभ हुआ। इस प्रकार तीन बॉडी तीन फेस्टिवल चलाती हैं जिनमें कुल मिलाकर छह कैटेगरी होती है। उसमें लोग बदले जाते हैं। फेस्टिवल चलता रहता है। कान में चल रहे इस फेस्टिवल को सम्मिलित रूप से कान फिल्म फेस्टिवल कहा गया।
    फिर इसके बाद मार्केट आता है। मार्केट में सभी खरीदारों की नजर पहले उन फिल्मों पर होती हैं। जो चुनी गई रहती हैं। निकी नहीं चुनी जाती है, वे भी मार्केट में थिएटर किराए पर लेकर अपनी फिल्में दिखा सकते हैं। वहां फस्र्ट कम फस्र्ट सिस्टम है। वहां स्क्रीनिंग बुक करनी होती है। मार्केट में नेटवर्किंग चलती है। मार्केट में उन फिल्मों पर च्यादा ध्यान रहता है, जो पहले दूसरे फेस्टिवल में जा चुकी हैं। लेकिन अभी बिकी नहीं हैं।
    फेस्टिवल में जब फिल्में चुनी जाती हैं तो उस पर दुनिया का ध्यान जाता है। ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की बात करूं तो हर लिस्ट में उसका नाम है। इसका मतलब भीड़ होगी। लोग देखेंगे। फिल्म को नया बाजार मिल सकता है। फिल्म सभी की नजर में आ जाती है तो उसे एक पुश मिल जाता है। कान की अपनी एक प्रतिष्ठा है। कान का चुनाव बेहतर माना जाता है। आपकी फिल्म वहां चुन ली गई। इसका मतलब है कि साल की बेहतरीन फिल्मों में आपकी फिल्म है। इससे फायदा होगा। हमारी (भारत) की फिल्मों को कभी उस तरह का दर्जा नहीं मिला। हमारी फिल्में सिर्फ हिंदुस्तानी दर्शकों के लिए बनती हैं। ऐसी फिल्म के बारे में पश्चिम की धारणा भी सीमित रही है। वे बॉलीवुड को ही पूरा इंडियन सिनेमा मान लेते हैं, जो कि है नहीं। तमिल और मराठी में जो फिल्में बन रही है उसे लोग देख ही नहीं पा रहे हैं। फेस्टिवल की एक मुख्य शर्त होती है कि फिल्म वहां के पहले कहीं देखी नहीं गई हो। मराठी और तमिल की बेहतरीन फिल्मों की जानकारी रिलीज के बाद मिलती है। कई बार वह भी नहीं मिलती। वे हम से बेहतर फिल्में बना रहे हैं। रास्ता खुलेगा उन लोगों के लिए भी।
- इस साल की भागीदारी तो अच्छी है?
0 इस साल तो बहुत ही अच्छा है। फिर भी कंपीटिशन में एक भी फिल्म नहीं है। याद नहीं कि आखिरी भारतीय फिल्म कब कंपीटिशन में गई थी। शायद एम एस सथ्यू की ‘गर्म हवा’ आखिरी फिल्म थी। वहां पहुंना जरूरी है। वहां पहुंचने पर ही हम फोड़ेंगे। अभी तक हम फोड़ नहीं पाए हैं। अभी हम अंदर घुसे हैं।
- क्यों नहीं पहुंच या फोड़ पा रहे हैं हमलोग?
0 हमलोग परवाह नहीं करते। हमारी सोच संगीर्ण हो गई है। हम यही सोच कर खुश होते हैं कि अपने दर्शकों के बीच फिल्म चल रही है न? तमिल सिनेमा को हिंदी में एक टिकट नहीं बेचना पड़ता। वे आत्मनिर्भर हैं। हिंदी सिनेमा हिंदुस्तान के बाहर की परवाह नहीं करता। बीच में हुआ भी तो एनआरआई के बारे में सोचा गया। हमें किसी कान या फेस्टिवल की जरूरत नहीं होती। इसका बुरा असर है कि हम ग्रो भी नहीं करते। कूपमंडूक बने हुए हैं। हम कंजरवेटिव और मौरिलिस्टिक फिल्में बनाते हैं। मुझे इसलिए जाने की जरूरी पड़ती है कि भारत के दर्शक मेरी फिल्म देख कर बोलते हैं कि अरे ये क्या बना दिया? इंडियन, डायस्पोरा तो और संकीर्ण है। वह तो भाग जाएगा। मेरा मार्केट मुझे मालूम है। वह फेस्टिवल के रास्ते से ही मिलेगा। उसका दाव चा - फेसिटव है। जब तक पुसूंग नहीं। तब तक कुछ मिलेगा ही नहीं।
- क्यों ऐसा हुआ है?
0 सच कहूं तो मेरी फिल्में यहीं के परिवेश की हैं। दर्शकों तक पहुंचती हैं तो वे पसंद भी करते हैं। समस्या एक्जीबिटर्स और डिस्ट्रिब्यूटर्स की है। उन्हें मेरी फिल्में यहां की नहीं लगतीं। मैं थोड़ा अलग काम कर रहा हूं। उन्हें लगता है कि मेरी फिल्मों का परिवशे हिंदुस्तानी नहीं है। वे मुझे स्पेस नहीं देते। मेरी फिल्में दर्शकों तक नहीं पहुंच पाती। आज ‘गुलाल’ के कितने प्रशंसक हैं? च्यादातर वे टीवी पर देखी हैं। थिएटर में लगी ही नहीं। डिस्ट्रिब्यूटर एक्जीविटर दीवार बन कर खड़ा है। उसका माइंडसेट बदलेगा। तभी सीनेरियो बदलेगा।
- गैंग्स ऑफ वासेपुर क्या है?
0 यह ठेठ हिंदुस्तानी फिल्म है। सच्ची कहानी है। यह धनबाद की कहानी है। माफिया की उत्पत्ति कैसे हुई। क्यों बना, क्या बना, क्या हाल है आज? लेकिन कहानी कहने के लिए डाक्यूमेंट्री नहीं बना सकता था। एक परिवार के जरिए कहानी कही है। एक परिवार की तीन पीढिय़ों की कहानी है। अगर यह वर्क करती है तो ऐसी और भी बहुत चीजें करने का मौका मिलेगा।
- फिल्म का ढांचा शुरू से ही तय था क्या?
0 मैंने तो पहले पूरी कहानी लिखी। इसे तीन हिस्सों में भी बना सकता था। 240 पन्नों की कहानी है। कहानी काटना नहीं चाहता था। कहानी काटकर ‘ब्लैक फ्रायडे’ में देख चुका था। दो हिस्सों में होने के बावजूद कहानी भागती है। लोगों ने कहा कि थोड़ी और लंबी होनी चाहिए थी। कहानी ठहरती नहीं, भागती है।
- भारत में इसकी रिलीज कैसे होगी? एक तो 22 जून को रिलीज होगी ़ ़ ़
0 दूसरे हिस्से का अभी तक नहीं किया है। भारतीय दर्शक एक साथ यह फिल्म नहीं देख सकेंगे। थिएटर वालों को लगता है कि साढे पांच घंटे की फिल्म कैसे लगाएंगे? दो इंटरवल दे तो भी पता नहीं दर्शक आएंगे या नहीं? दिन में दो ही शो दिखा पाएंगे? फिर टिकट का क्या होगा? अच्छी बात है कि दोनों इंपेपेंडेट फिल्म भी है। 80 प्रतिशत फिल्म पूरा हो जाती है। पहले और दूसरे हिस्से का अंत होता है। कहानी पकड़ेगी नहीं तो दूसरा पार्ट अगले दिन रिलीज होने पर भी दर्शक देखने नहीं जाएंगे। कहानी पकड़ लेगी तो एक-दो महीने का इंतजार भी चलेगा। ‘लॉर्ड ऑफ द रिंग्स’ तीन पार्ट में बनी थी और पूरी कहानी तीसरे पार्ट में आकर खत्म होती है। तीन साल में रिलीज हुई। इस फिल्म के तीनों पार्ट को लोगों ने देखा।
- वायकॉम 18 के आने से ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ को कितना लाभ हुआ?
0 वायकॉम 18 आगे नहीं आता तो फिल्म बन ही नहीं पाती। यह फिल्म और भी लोगों ने सुनी। सब घबराए हुए थे कि कैसी फिल्म होगी। दो पार्ट में है। स्टार नहीं है। महंगी भी है। वायकॉम ने यह सब नहीं देखा। उन्होंने कहानी सुनी। विश्वास जताया कि करते हैं। महंगी तो उन्हें भी लगी थी, लेकिन उन्होंने विश्वास किया। इसलिए फिल्म बन पाई। वायकॉम मेरे साथ जुड़ा रहा। यही नहीं ‘शैतान’, ‘येलो बूट्स’ और ‘अय्या’ भी बनाई। ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ भी बनाई मेरे साथ डिफिकल्ट फिल्में कीं।
- आप बार-बार महंगी फिल्में क्यों कह रहे हैं। इन दिनों जितनी भी फिल्में बन रहीं हैं। उनमें तो आप ऐसी दस फिल्में बना सकते हैं?
0 यह फिल्म मेरे हिसाब से महंगी है। मैंने अभी तक इतनी महंगी फिल्म नहीं बनाई। मार्केट के हिसाब से महंगी फिल्म नहीं है। ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ बीस करोड़ में बनी है। इन दिनों तो सौ-दो सौ करोड़ की भी फिल्में बन रही हैं। इसके पहले मेरी फिल्म ‘देव डी’ छह करोड़ की फिल्म थी।
- रिलीज की क्या प्लानिंग है?
0 हमलोग इसे मल्टीप्लेक्स और सिंगल स्क्रीन दोनों जगह रिलीज करेंगे। अभी तक यह मेरी सबसे बड़ी रिलीज होगी। मेरे ख्याल में लगभग हजार प्रिंट तो रिलीज होंगे ही।
- आपने कहा कि कान फिल्म फेस्टिवल जाने से आपकी फिल्म को नए खरीददार मिल सकते हैं। अभी क्या स्थिति है?
0 हमें एक इंटरनेशनल एजेंट मिला है - एलड्राइवर । हमलोग की कोशिश है कि पूरे यूरोप में बिके। इस फिल्म को लेकर हमलोग ऑस्ट्रेलिया भी जा रहे हैं। वहां  यह फिल्म कम्पीटिशन सेक्शन में है। यह फिल्म ऐसे-ऐसे मार्केट में जाएगी जो उन देशों के मेन स्ट्रीम मार्केट हैं। मैं सिर्फ इंडियन ड्रायस्पोरा पर निर्भर नहीं रहना चाहता हूं।
- इंटरनेशनल स्तर पर आज अनुराग कश्यप का एक पहचान है। मुझे मालूम है आपने कितने धैर्य, लगन और अपमान के बावजूद इस कोशिश में लगे रहे। हालांकि उपरी तौर पर लगता है कि आपने अपने लिए जगह बनाई है। लेकिन यह भी सच है कि आपके माध्यम से भारतीय सिनेमा और प्रतिभाएं वहां पहुंच रही हैं। आप भारत के प्रतिनिधि हो जाते हैं।
0 अभी एक झरोखा खुला है। यों समझिए कि बंबई की लोकल ट्रेन में किसी तरह चढऩे की जगह मिल गई है। अब ट्रेन चल रही है। विंडो सीट मिलना अभी बहुत दूर है। हां यह विश्वास है कि हमारी मेहनत का नतीजा बच्चों को मिलेगा। अगली पीढ़ी को मिलेगा। हमलोग जिस तरह का सिनेमा बना रहे हैं उससे यह उम्मीद बनती है कि हम इंटरनेशनल मंच पर रेगुलर दिखाई पड़ते रहेंगे। अगले दो-तीन सालों में हमें कम्पीटिशन सेक्शन में भी जगह मिलेगी।
- अनुराग कश्यप अब एक ब्रांड है। वह एक ऐसी खूंटी बन गए हैं जहां कोट के साथ लंगोट भी टंगे रहते हैं।
0 यह तो अच्छी बात है। यह आजादी अच्छी है। मेरी कोशिश रहेगी कि हर एक कोट के बाद दो लंगोट टंगे। मेरी यही शैली रहेगी। ‘वासेपुर’ के बाद एक ‘अगली’ बनाऊंगा और ‘मुंबई बेलवेट’ के बाद दो छोटी फिल्में बनाऊंगा। आपने सही कहा मैं हर एक डिजायनर कोट के बाद दो लंगोट टांगता रहूंगा। कोट में आदमी बहुत बंधा-बंधा रहता है। आजादी तो लंगोट में ही रहती है।
- ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की संरचना, अवधारणा और प्रस्तुति के बारे में कुछ बताएं?
0 कल्की का नाटक चल रहा था। मैं बाहर बैठा हुआ था वहां दो लडक़े आए। उनमें एक जामियां का था। उन्होंने एक कहानी सनाई। वह बहुत ज्यादा ‘सिटी ऑफ गॉड’ जैसी थी। मैंने कहा भी कि क्या ‘सिटी ऑफ गॉड’  सुना रहे हो? उन्हें बुरी लगी मेरी बात। उन्होंने जोर देकर कहा कि नहीं सर, ऐसा होता है प्रूव करने के लिए वे जीशान चौधरी को लेकर आए। और पेपर कटिंग्स लाए। मुझे लगा कि वे सिनेमा देखते आए हैं। उन्होंने फार्मेट चुना और वैसे ही घटनाएं डाल दी। सुनने में लगता है कि कोई अलग फिल्म है? वे बार-बार कह रहे थे कि ऑस्कर जाएगी। उन्होंने न्यूज कटिंग्स दिखाई। मैंने कहा कि फिल्म तो इन कटिंग्स में है। वहां ओरिजनल फिल्म है। मैं गैगस्टर फिल्म क्यों बनाऊं। ‘सत्या’ हो गई। ‘ब्लैक फ्रायडे’ हो गई। बनाने का इच्छुक नहीं था। मुझे फिर भी वे लोग, वह जगह इंटरेस्टिंग लगी। मैंने जीशान को बोला तुम जाकर रिसर्च करो और पूरी कहानी लिख कर दो। उसने फिर 150 पन्नों का हिंदी में उपन्यास लिखा। उस उपन्यास पर मैंने स्क्रिप्ट लिखी। पूरी कहानी इतनी कमाल की है की है। सुल्ताना डाकू से शुरू होती है। सुल्ताना डाकू पर रिसर्च किया तो पता चला कि इसने तो अपने विलीब से लिखा है कि सुल्ताना डाकू वासेपुर का था। यह विलीब इसलिए है कि वासेपुर का हर आदमी मानता है कि सुल्ताना डाकू वहींं का था। रिसर्च कुछ और था। सुल्ताना डाकू का मिथ लिया - सुल्ताना डाकू के मिथ से वासेपुर की कहानी कही गई है। एक फैमिली में कहानी रखी। आज वे बड़े माफिया माने जाते हैं। छोटी से रायवेल्री कैसे बड़ी हो गई। कहां से बाहर का मिनिस्टर आया जो नेता था, जो यूनियन लीडर था। इनकी जो कहानी है, वह नया संसार रचती है। माफिया शब्द कहां से शुरू हुआ। हर माफिया फिल्म के साथ दिक्कत है कि वे केवल गोली भरते दिखाई पड़ते हैं। माफिया का नाम क्या है? उसका बिजनेश क्या है? उसे माफिया कहते क्यों है? फिर धीरे-धीरे समझ में आया।
    जहां भी इस तरह की समस्या शुरू हुई है। वह नैचुरल रिसोर्सेज से शुरू हुई है। आदमी को लगता है कि हमारी जमीन के नीचे कोयला है तो उस पर हमारा भी हक है। यह सरकारी कैसे हो गया? लोगों को लगता है कि गिने-चुने लोग ही इसका फायदा क्यों उठा रहे हैं। सब को फायदा क्यों नहीं हो रहा है? कानूनी  नहीं तो गैरकानूनी तरीके से वह चोरी करने लग गया। चोरी पकड़ी जाती है तो बचने के लिए चार चोर मिल जाते हैं। धीरे-धीरे यह माफिया का रूप ले लेता है। यहां से माफिया चालू हुआ। फिर यूनियन बना तो यूनियनबाजी होनी लगी। यूनियन का माफिया चलने लगा। उसे रोकने के लिए राष्ट्रीयकरण किया गया तो सरकारी माफिया बन गया। माफिया की धूरी बदलती गयी। मुझे लगा कि सिर्फ कोयले की कहानी कहूंगा तो बात नहीं बनेगी। इसलिए मैंने परिवार की कहानी चुनी। वे जब तक कोयले के धंधे में थे तब तक कहानी कोयले की है। फिर वह लोहे लक्कड़ और बालू के धंधे में गए। इस तरह हम माफिया को व्यापक रूप में देख सके। कोयला का खनन चालू हुआ तो कहानी कोयले तक रही। तब रेल गाड़ी आयी। जब नयी चीजें पुराने होने लगी तो माफिया ने भी अपना रंग-ढंग बदला। कबाड़ का ही बड़ा बिजनेश है। कबाड़ के धंधे में बहुत बड़ा फायदा है। रेल गाड़ी का कबाड़ बेचा जाता है तो बहुत आमदनी होती है। इन सारी घटनाओं की परिपेक्ष्य में बदले की कहानी भी चल रही है। बहुत सारी चीजें हमने जोड़ी भी। हर दस साल में एक नया विलेन खड़ा हो जाता है। हमने सारे विलेन को जोडक़र एक विलेन बना दिया। यह कहानी हीरो से नहीं चलकर विलेन से चलती है। उस भूमिका में तिग्मांशु धूलिया हैं। माफिया में बदले की इतनी प्लानिंग नहीं होती है। वे तो बस ताक में रहते हैं। वे थेथर लोग हैं। उन्हें जहां भी मौका मिलता है वहीं घुस कर गोली मार देते हैं। वहां ऐसे ही बदला लिया जाता है। उन्हें मौके का इंतजार रहता है। इसी इंतजार में मेरी कहानी आगे बढ़ती जाती है। वे लोग मौका खोज रहे हैं कि वह कब वापस धनबाद आए और हमलोग उसे निशाना बना दें। वहां जिस तरह से घटनाएं घटती हैं वैसे ही हमने कहानी लिखी है। हमने फिल्म का अप्रोच वैसा ही रखा है। आपको अचानक नहीं लगेगा कि कोई किरदार बहुत इंटेलिजेंट हो गया है। वे सब शुरू से इंटेलिजेंट नहीं हैं। ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की कहानी इस तरह बुनी गयी।
    संगीत के लिए हमने तय किया था कि जमीन का म्यूजिक लेंगे। जमीन का म्यूजिक कई बार लोगों को बोरिंग भी लगता है। लोगों को लगता है कि आज कल के धिन चक धिन चक के जमाने में यह कौन सा म्यूजिक लेकर आ गए। हमने वहां की आवाजों, धुनों और संगीत को लेकर काम किया। ‘जिय हो बिहार के लाला’ का मुखड़ा ट्रेडिशनल है। अंतरे बाद में जोड़े गए। ‘तनि नाचि तनि घूमि सब के मन बहलाव रे भइया’ बाद में जोड़ा गया। हमने बहुत सारे गाने ऐसे ही उठाए हैं। उन्हें आज के संगीत और वाद्य से जोड़ा। उन्हें समकालीन बनाया।
    ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ फिल्म की कहानी बढऩे के साथ टेकनीक भी आधुनिक होती जाती है। हम लोगों ने क्लासिक तरीके से शुरू किया है। धीरे-धीरे सब कुछ कंटम्परेरी होता चला जाता है। बहुत सारी चीजें हमें छोडऩी पड़ी। फिल्म में जम्प है। फैमिली में जब कुछ नहीं हो रहा होता है तो कहानी सीधे जम्प मारती है। जो लोग वहां के भूगोल, राजनीति और इतिहास से परिचित हैं वे सभी किरदारों को पहचान लेंगे। कई किरदारों के हम लोगों ने नाम नहीं रखे हैं। उनकी केवल शक्ल मिलती है। जब धनबाद के लोग आराम से पहचान जाएंगे कि किसके साथ क्या हुआ था? हम लोगों ने सबके नाम बदल दिए हैं। अच्छे लोगों के नाम वही रहने दिए हैं। अच्छे आदमी को अच्छा-अच्छा दिखाओ तो कोई बुरा नहीं मानता।
फिल्म की कास्टिंग बहुत जबरदस्त रही। बंबई, बनारस, पटना, धनबाद आदि जगहों से भी कलाकार लिए गए। सरदार खान तो लिखते समय ही तय था कि मनोज बाजपेयी करेंगे। उन मनोज और मेरे बीच बातचीत बंद थी। मैंने फोन उठा कर सीधा घुमा दिया। मैंने पूछा एक्टिंग करोगे? मेरे पास एक रोल है। रात के ग्यारह बज रहे थे उस समय। वे उस समय मेरे पास आए। पूछा क्या पीते हो? मैंने कहा आज कल केवल रेड वाइन पीता हूं। रेड वाइन मंगवाई गई। रेड वाइन पीते हुए स्क्रिप्ट सुना और हां कह दिया। जिशान कादरी ने तो पहले से ही तय कर लिया था कि एक रोल मैं ही करूंगा। उसने डेफिनिट का कैरेक्टर किया है। बाकी कास्टटिंग मुकेश छाबड़ा ने किया। नवाज तो मेरे साथ पहले भी काम कर चुके हैं। बहुत ही उम्दा एक्टर है। इस फिल्म में लोग उनको तवज्जो देंंगे।
- इस फिल्म की शूटिंग आपने धनबाद में ही क्यों नहीं की?
0 जब रीयल घटनाओं पर कोई फिल्म बनाते हैं तो रीयल लोकेशन पर उसे शूट करने में दिक्कत होती है। लोकल सब की कहानी जानते रहते हैं। थोड़ा भी इधर-उधर हुआ तो हंगामा हो जाता है। बाहर शूट करने का फायदा यह है कि वहां के लोग कहानी और किरदारों से परिचित नहीं होते हैं। स्थानीय लोग हमेशा सब्जेक्टिव होते हैं। शूट करते समय पूछते रहेंगे कि यह कैरेक्टर कौन सा है? कुछ भी बेमेल लगा तो उन्हें आपत्ति होगी। कोई और नाम बता दो तो पूछेंगे कि इस नाम का कोई आदमी ही नहीं था। सही नाम बताओ तो सवाल होगा कि वो तो वैसा नहीं था। बहुत टेंशन रहता है। इसलिए अच्छा है कि ऐसी जगह फिल्म बनाओं जहां किसी को कुछ पता हीं न हो। हॉलीवुड में ऐसा ही करते हैं। ‘ब्लैक फ्रायडे’ के समय मैंने यह मुसीबत झेली थी। जब आरडीएक्स की लैंडिंग दिखा रहे थे तो पूरा गांव इक_ा हो गया था। पूछने लगा कि यह क्यों कर रहे हो? उन्होंने कहा कि आप करोगे बाद में पुलिस आकर हम से पूछेगी। दिक्कतों से बचने के लिए हमने ऐसा किया। धनबाद में हमने कोयला खदानों के अंदर शूटिंग की। वह भी हमने पांचवें-छठे दशक के सीन शूट किए। उस समय के लोग या उनके परिचित अब बचे नहीं हैं। बाहर के एक्सटीरियर सीन हमने धनबाद में लिए। झरिया में भी शूट किया। हमलोग सब जगह शूट करते गए। असल कहानी और ड्रामा दिखाने के लिए हम लोगों ने बनारस के आस पास की जगह चुनी। पहले का वासेपुर और धनबाद दिखाने के लिए हम लोगों ने मिलते-जुलते गांव चुने। शुरू में धनबाद और वासेपुर अलग-अलग थे। बाद में विकास होने पर दोनों गडमड हो गए। यह सब क्रिएट करना बड़ा मुश्किल काम था। फिल्म ढेर सारी जगहों पर शूट की गई।
- मीडिया और कुछ हलकों में ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ को लेकर यह शिकायत की जा रही है कि इसमें जिस तरह से गाली-ग्लौज और हिंसा दिखायी गई है उससे बिहार की छवि खराब होती है।
0 पहले लोगों की समस्या थी कि बिहार के विषय नहीं उठाए जाते। मुझे जो विषय और कहानी मिली मैंने उस पर फिल्म बनायी है। अब अगर ट्रेलर देख कर कोई जज करेगा तो फिर यह उनकी नजरों का धुंधलापन है। मैं अभी कुछ नहीं कहूंगा। वे लोग पिक्चर रिलीज होने का इंतजार करें। फिल्म देखें और फिर अपनी राय दें। अगर कोई कह रहा है कि बिहार में लव स्टोरी है या दूसरी तमाम चीजें हैं तो भोजपुरी फिल्में तो वह सब दिखा ही रही है। मैंने जिस तरह की फिल्म बंबई के बारे में या दिल्ली के बारे में बनाई है वैसी ही फिल्म बिहार के बारे में बनाई है। मैंने सारी जिंदगी जिस तरह की फिल्म बनाई है वैसी ही फिल्म बिहार पर भी बना रहा हूं। इस तरह से कहेंगे तो मैंने हिंदुस्तान को हमेशा निगेटिव इमेज में दिखाया है। इस तथ्य को आगे बढ़ाऊं तो ज्यादातर फिल्ममेकर अपने समाज की निगेटिव चीजें या बुराईयों को ही दिखाते हैं। पॉलिटिक्स में अगर फिल्म बनती है तो पॉलिटिक्स की बुराई होती है। ये सब कहने की बातें हैं। ऐसे लोगों से मुझे एक ही बात कहनी है कि अपनी दुनिया से जरा बाहर निकलिए। देखिए कि कैसी फिल्में बन रही हैं। समाज की पॉजिटिव चीजें दिखा-दिखा कर हिंदी सिनेमा ने दर्शकों की आंखों पर चश्मा चढ़ा दिया है उसे उतारने की जरूरत है। इस फिल्म में यही बात कही गयी है कि कैसे फिल्मों में अच्छी-अच्छी चीजों को दिखा कर दशकों से दर्शकों को बेवकूफ बनाया जा रहा है। हमारे आस पास जो हो रहा है या जो हो चुका है उसे भी दर्ज करना और आईना दिखाना जरूरी है। फिल्मकार के तौर पर मुझे इसी में इंट्रेस्ट है और मैं यही करता रहूंगा। अच्छी बातें तब करूंगा जब अच्छी बातें होंगी। आज बिहार में सब कुछ बदल रहा है। अच्छा हो रहा है। तो कल को अच्छा चित्रण भी होगा। हमें अच्छी कहानी मिलेगी तो अच्छी फिल्म बनाएंगे।



Thursday, May 31, 2012

रियल ड्रामा और पॉलिटिक्स है ‘शांघाई’ में

 
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अपनी चौथी फिल्म ‘शांघाई’ की रिलीज तैयारियों में जुटे बाजार और विचार के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी यह फिल्म दिल्ली से बाहर निकली है। उदार आर्थिक नीति के के देश में उनकी फिल्म एक ऐसे शहर की कहानी कहती है, जहां समृद्धि के सपने सक्रिय हैं। तय हआ है कि उसे विशेष आर्थिक क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाएगा। राज्य सरकार और स्थानीय राजनीतिक पार्टियों ने स्थानीय नागरिकों को सपना दिया है कि उनका शहर जल्दी ही शांघाई बन जाएगा। इस राजनीति दांवपेंच में भविष्य की खुशहाली संजोए शहर में तब खलबली मचती है, जब एक सामाजिक कार्यकर्ता की सडक़ दुर्घटना में मौत हो जाती है। ज्यादातर इसे हादसा मानते हैं, लेकिन कुछ लोगों को यह शक है कि यह हत्या है। शक की वजह है कि सामाजिक कार्यकर्ता राजनीतिक स्वार्थ के तहत पोसे जा रहे सपने के यथार्थ से स्थानीय नागरिकों को परिचित कराने की मुहिम में शामिल हैं। माना जाता है कि वे लोगों को भडक़ा रहे हैं और सपने की सच्चाई के प्रति सचेत कर रहे हैं।  
 दिबाकर बनर्जी राजनीतिक पृष्ठभूमि की फिल्म ‘शांघाई’ में हमें नए भारत से परिचित कराते हैं। यहां जोगिन्दर परमार, टीए कृष्णन, डाक्टर अली अहमदी,शालिनी सहाय जैसे किरदार हैं। वे समाज के विभिन्न तबकों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। रियल इंडिया की इस फिल्म में हिंदी फिल्मों के प्रचलित ग्रामर का खयाल नहीं रखा गया है। दिबाकर बनर्जी हमेशा की तरह वास्तविक और विश्वसनीय किरदारों के माध्यम से अपनी कहानी कह रहे हैं। वे स्वीकार करते हैं कि उन्हें बाजार के दबाव के बीच काम करना पड़ रहा है, लेकिन उन्हें बाजार की जरूरतों से कोई गुरेज नहीं है। रिलीज के एक महीने पहले उन्हें इमरान हाशमी के साथ एक गाने की शूटिंग करनी पड़ी है। फिल्म में इसकी जरूरत नहीं थी, फिर भी मार्केटिंग टीम की सलाह पर उन्होंने सूफियाना अंदाज का यह गीत इमरान हाशमी के प्रशंसकों और दर्शकों के लिए रखा। वे कहते हैं, ‘यह गाना मेरी फिल्म के कथ्य को प्रभावित नहीं करेगा और बाजार की जरूरत भी पूरी हो जाएगी।’ 
 ‘शांघाई’ में अभय देओल और इमरान हाशमी का साथ आना रोचक है। दोनों के बीच बमुश्किल चार सीन होंगे, लेकिन उनकी मौजूदगी अलग-अलग समूहों के दर्शकों को फिल्म से जोड़ेगी। दिबाकर कहते हैं, ‘फिल्म में जोगिन्दर परमार के किरदार के लिए उनसे बेहतर एक्टर नहीं हो सकता था। हर छोटे शहर में दो-चार ऐसे शख्य होते हैं। यह किरदार इमरान हाशमी की इमेज के साथ मैच करता है और फिल्म के लिए बिल्कुल उचित है।’ दिबाकर की बातचीत से पता चलता है कि पॉलिटिकल थ्रिलर के तौर पर बनी उनकी ‘शांघाई’ में आम दर्शकों के मनोरंजन का पूरा ख्याल रखा गया है। ‘जिंदगी का रियल ड्रामा किसी फैंटेसी से अधिक इंगेजिंग होता है’, कहते हैं दिबाकर बनर्जी। दिबाकर बनर्जी ने इस बार एक अलग लेवल पर ड्रामा रचा है।  

साथ आना अभय देओल और इमरान हाशमी का

 
-अजय ब्रह्मात्मज
फिल्म देखने के बाद दिबाकर बनर्जी के इस अहम फैसले का परिणाम नजर आएगा। फिलहाल अभय देओल और इमरान हाशमी का एक फिल्म में साथ आना दर्शकों को हैरत में डाल रहा है। फिल्म के प्रोमो से जिज्ञासा भी बढ़ रही है। कुछ धमाल होने की उम्मीद है। अभय देओल हिंदी फिल्मों के विशिष्ट अभिनेता हैं। इमरान हाशमी हिंदी फिल्मों के आम अभिनेता हैं। दोनों के दर्शक और प्रशंसक अलग हैं। दिबाकर बनर्जी ने ‘शांघाई’ में दोनों को साथ लाकर अपनी कास्टिंग से चौंका दिया है।
    ‘सोचा न था’ से अभय देओल की शुरुआत हुई। देओल परिवार के इस हीरो की लांचिंग पर किसी का ध्यान भी नहीं गया। उनके पीठ पीछे सनी देओल के होने के बावजूद फिल्म की साधारण रिलीज हुई। फिर भी अभय देओल ने पहले समीक्षकों और फिर दर्शकों का ध्यान खींचा। कुछ फिल्मों की रिलीज के पहले से ही चर्चा रहती है। ऐसी फिल्म रिलीज के बाद ठंडी पड़ जाती हैं। जिन फिल्मों पर उनकी रिलीज के बाद निगाह जाती है, उन्हें दर्शक और समीक्षकों की सराहना बड़ी कर देती है। ‘सोचा न था’ ऐसी ही फिल्म थी। इस फिल्म ने इंडस्ट्री को तीन प्रतिभाएं दीं - अभय देओल, आएशा और इम्तियाज अली।
    इसके विपरीत भट्ट परिवार से संबद्ध फिल्मों में विक्रम भट्ट के सहायक के तौर पर आए। उनमें महेश भट्ट को कुछ खास दिखा। उन्होंने उन्हें कैमरे के सामने लाकर खड़ा कर दिया। आरंभिक फिल्मों में इमरान हाशमी के लुक, प्रेजेंस और एक्टिंग की तीखी आलोचना हुई, लेकिन महेश भट्ट की बदौलत इमरान हाशमी टिके रहे। भट्ट परिवार उन्हें फिल्म दर फिल्म दोहराता रहा। विशेष प्रयास से उनकी सभी फिल्मों के कुछ गाने पॉपुलर होते गए और उन गानों के सहारे इमरान हाशमी भी देश के चवन्नी छाप दर्शकों के बीच अपनी जगह बनाते गए। ‘मर्डर’ फिल्म की कामयाबी ने इमरान हाशमी को ‘किसिंग स्टार’ का खिताब दिया। इस फिल्म के बाद इमरान हाशमी के पास उन्नति के सिवा कोई चारा नहीं रह गया। वे अपनी रफ्तार से लोकप्रियता की सीढियां चढ़ते गए। उन्होंने लगन, मेहनत और एकाग्रता से खास जगह बना ली।
    दरअसल, इमरान हाशमी की कामयाबी फिल्म अध्येताओं के पाठ और अध्ययन का विषय हो सकती है। देश के बदलते दर्शकों से इमरान हाशमी की लोकप्रियता का सीधा संबंध है। फिल्म ट्रेड में जिसे बी और सी सेंटर कहते हैं, वहां इमरान खासे पॉपुलर हैं। उनकी हर फिल्म बिहार में अच्छा बिजनेश करती है। इसके साथ ही वे पाकिस्तान में हिंदी फिल्मों के खान से पॉपुलर स्टार हैं। फिलहाल, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के तमाम बड़े बैनर उनमें खास रुचि ले रहे हैं। निर्देशकों और दर्शकों की बढ़ती मांग की वजह से उन्हें भट्ट कैंप की चहारदीवारी छलांगनी पड़ी है।
    दूसरी तरफ अभय देओल ने ‘आउट ऑफ बाक्स’ फिल्मों में जगह बनाने के बाद मेनस्ट्रीम फिल्मों में भी प्रवेश किया है। ‘जिंदगी ना मिलेगी दोबारा’ में फरहान अख्तर और रितिक रोशन के साथ उनकी तिगड़ी पसंद की गई। फिलहाल वे प्रकाश झा की ‘चक्रव्यूह’ की शूटिंग कर रहे हैं। अपने दोनों बड़े भाइयों (सनी और बॉबी) से अलग छवि और फिल्मों में उनकी रुचि है। उन्होंने इस धारणा को तोड़ा है कि स्टारसन हमेशा कमर्शिल फिल्मों में कैद रहते हैं।
    अब इन दोनों को साथ लाकर दिबाकर बनर्जी दर्शकों के विशाल समुदाय को ‘शांघाई’ के लिए थिएटर में लाएंगे। दिबाकर बनर्जी की फिल्में अभी तक शहरी दर्शकों के बीच चर्चित और प्रशंसित रही हैं। इस बार उन्होंने इमरान हाशमी के साथ अपना दायरा तोड़ा है। इससे उन्हें फायदा होगा और अप्रत्यक्ष रूप से दर्शक भी फायदे में रहेंगे। इमरान हाशमी के प्रशंसक और दर्शक इसी बहाने दिबाकर बनर्जी की फिल्म से परिचित होंगे।

मेनस्ट्रीम सिनेमा को ट्रिब्यूट है ‘राउडी राठोड़'-संजय लीला भंसाली

-अजय ब्रह्मात्‍मज
अक्षय कुमार और सोनाक्षी सिन्हा की प्रभुदेवा निर्देशित ‘राउडी राठोड़’ के निर्माता संजय लीला भंसाली हैं। ‘खामोशी’ से ‘गुजारिश’ तक खास संवेदना और सौंदर्य की फिल्में निर्देशित कर चुके संजय लीला भंसाली के बैनर से ‘राउडी राठोड़’ का निर्माण चौंकाता है। वे इसे अपने बैनर का स्वाभाविक विस्तार मानते हैं।
  - ‘राउडी राठोड़’ का निर्माण किसी प्रकार का दबाव है या इसे आपकी मुक्ति समझा जाए?
 0 इसे मैं मुक्ति कहूंगा। मेरी सोच, मेरी फिल्म, मेरी शैली ही सब कुछ है ... इन से निकलकर अलग सोच, विषय और विचार से जुडऩा मुक्ति है। मैं जिस तरह की फिल्में खुद नहीं बना सकता, वैसी फिल्मों का बतौर प्रोड्यूसर हिस्सा बनना अच्छा लग रहा है। मैं हर तरह के नए निर्देशकों से मिल रहा हूं। ‘माई फ्रेंड पिंटो’, ‘राउडी राठोड़’,  ‘शीरीं फरहाद की तो निकल पड़ी’ ऐसी ही फिल्में हैं। 
 - आप अलग तरह के सिनेमा के निर्देशक रहे हैं। खास पहचान है आपकी। फिर यह शिफ्ट या आउटिंग क्यों? 0 ‘गुजारिश’ बनाते समय अनोखा अनुभव हुआ। वह फिल्म मौत के बारे में थी, लेकिन उसने मुझे जिंदगी की पॉजीटिव सोच दी। उसने मुझे निर्भीक बना दिया। लगा कि मैं अपनी क्रिएटिविटी के बिखर जाने से डरा हुआ हूं, जबकि ऐसा है नहीं। मैं ‘राउडी राठोड़’ नहीं निर्देशित कर सकता। उस फिल्म को प्रभु देवा अच्छी तरह बना सकते हैं। मैं उसे दर्शकों तक ले जाने का जरिया बन सकता हूं। इसी बहाने मैं ज्यादा से ज्यादा तरह की फिल्मों का हिस्सा होना चाहता हूं। मैं अब पहले की तरह स्वार्थी नहीं रह गया। 
 - ‘राउडी राठोड़’ का संयोग कैसे बना?
 0 मैंने तमिल फिल्म देखी ‘विक्रम्राउकड़ू’। हिंदी में उसके रीमेक के बारे में सोच लिया था कि मैंने कि हिंदी में राउडी फिल्म बनानी है। ‘राउडी राठोड़’ तभी ताम पड़ गया था। प्रभु देवा और अक्षय कुमार मेरे प्रस्ताव से चौंके। मेरे अंदर मेनस्ट्रीम सिनेमा रहा है। अलंकार, मिनर्वा और ग्रांट रोड के आसपास के सिनेमाघरों में बड़े होते समय मेनस्ट्रीम फिल्में देखी थीं। सिनेमा से आकर्षण तो वहीं बना। बाद में एफटीआईआई गया तो सिनेमा के प्रति अप्रोच बदला। उसके प्रभाव में मैंने ‘खामोशी’ बनाई। वैसे मेरे पिताजी ने ‘जहाजी लुटेरा’ बनाई थी। उस तरह की मसाला मेनस्ट्रीम फिल्में दिल में बनी रही हैं। मैं उस मेनस्ट्रीम सिनेमा को एंज्वॉय करना चाहता हूं। इसे मेरा भटकाव न समझें।  
- मेनस्ट्रीम के प्रति यह झुकाव क्यों और कैसे बढ़ा?
 0 मैंने बताया कि वह सिनेमा मेरे अंदर है। देश का दर्शक अभी भी नहीं बदला है। हमारे दर्शकों को फुल एंटरटेनमेंट चाहिए। हमलोग आर्ट सिनेमा, पैरेलल सिनेमा या आउट ऑफ बाक्स सिनेमा भी बनाएं, लेकिन ज्यादा दर्शकों को मेनस्ट्रीम सिनेमा चाहिए। अभी वैसी फिल्में खूब पसंद की जा रही है। उनकी क्वालिटी भी बढ़ी है। ‘राउडी राठोड़’ मेरी किशोरावस्था की याद और मेनस्ट्रीम सिनेमा को ट्ब्यिूट है। यही हमारा क्लासिक सिनेमा है। दर्शक ऐसी फिल्मों  डायलॉग से खुश होते हैं। गानों पर नाचते हैं। ‘मैं फौलाद की औलाद हूं’ सुन कर ढेर सारे दर्शक खुश होंगे। मेरे लिए यह फिल्म कैथारसिस रही। 
 - बाकी फिल्मों में आपकी भागीदारी कितनी और कि स्तर की रहती है? 
मैं स्क्रिप्ट चुनने से लेकर कास्टिंग तक इन्वॉल्व रहता हूं। उसके बाद डायरेक्टर की फिल्म होती है। मैं सेट या शूटिंग पर नहीं जाता। डायरेक्टर पर भरोसा होता है। तभी तो चुनता हूं। और फिर मुझे ही दिन-रात लगा रहना पड़े मैं अपनी फिल्म डायरेक्ट कर लूंगा।  
- इस फिल्म के लिए अक्षय कुमार और सोनाक्षी सिन्हा ही क्यों?
 0 ‘राउडी राठोड़’ का राउडीपना अक्षय कुमार ही ला सकते हैं। एक्शन, रोमांस, कॉमेडी और ड्रामा सभी तरह से वे इस फिल्म के लिए सबसे योग्य थे। सोनाक्षी सिन्हा टैलेंटेड और श्रीदेवी की तरह की हीरोइन हैं। उनमें एक अलग चार्म है। मेरी फिल्म के लिए दोनों फिट रहे।
 -आप की फिल्म कब शुरू होगी?  
 0 मैंने ‘राम लीला’ के बारे में साचा है। मैं अपनी मां के नाम से एक फिल्म बनाना चाहता था। इस फिल्म में रणवीर सिंह और करीना कपूर हैं। दोनों जबरदस्त एक्टर हैं। मेरी फिल्म की शूटिंग अगस्त में शुरू होगी। गुजरात में कच्छ और मुंबई में शूटिंग होनी है। 


Monday, May 28, 2012

सत्‍यमेव जयते- 4:स्वस्थ समाज का सपना-आमिर खान

बेशकीमती हैं बच्चियां
मैं सपने देखना पसंद करता हूं और यह उन कारणों में से एक है कि मैं सत्यमेव जयते शो कर पाया हूं। मेरा सपना है कि एक दिन हम ऐसे देश में रह रहे होंगे जहां चीजें बदली हुई होंगी। मेरा स्वप्न है कि एक दिन अमीर और गरीब एक ही तरह स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाएंगे। बहुत से लोगों को यह दृष्टिकोण पूरी तरह अव्यावहारिक लग सकता है, किंतु यह सपना देखने लायक है। और ऐसा कोई कारण नहीं है कि यह पूरा न हो सके। कोई अमीर हो या गरीब, किसी प्रिय को खोने का दुख, दोनों को बराबर होता है। अगर कोई बच्चा ऐसी बीमारी से ग्रस्त है जिसका इलाज संभव है, किंतु हम पैसे के अभाव में उसका इलाज न करा पाने के कारण उसे अपनी आंखों के सामने मरता हुए देखने को मजबूर हैं तो इससे अधिक त्रासद कुछ नहीं हो सकता। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का डेढ़ फीसदी से भी कम सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च होता है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में बरसों से काम करने वाले और हमारे शो में आए एक मेहमान डॉ. गुलाटी का कहना है कि स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में जीडीपी का कम से कम छह फीसदी खर्च होना चाहिए। मैं न तो अर्थशास्त्री हूं और न ही डॉक्टर, फिर भी मेरी नजर में सही आंकड़ा आठ से दस प्रतिशत होना चाहिए। अगर समाज ही स्वस्थ नहीं होगा तो अधिक जीडीपी का क्या फायदा। आर्थिक समृद्धि तभी हासिल हो सकती है, जब हम स्वस्थ होंगे। स्वास्थ्य राज्य का विषय है और प्रत्येक राज्य केवल अप्रत्यक्ष कर ही इकट्ठा करता है। हमारे पैसे से अधिक अस्पताल क्यों नहीं खोले जाते और इससे भी महत्वपूर्ण यह कि इस पैसे को सार्वजनिक मेडिकल कॉलेज बनाने में खर्च क्यों नहीं किया जाता? देश को बड़ी संख्या में सरकारी मेडिकल कॉलेजों की आवश्यकता है, किंतु केंद्र और राज्य सरकारें इसकी इच्छुक दिखाई नहीं देतीं। इसलिए छात्रों को मजबूरी में निजी कॉलेजों का रुख करना पड़ रहा है, जिनमें से अधिकांश 50 से 60 लाख रुपये प्रति छात्र अनधिकृत रूप से चंदे के रूप में वसूल कर रहे हैं। अधिकांश निजी मेडिकल कॉलेज व्यापार में बदल गए हैं। इनमें से बहुतों के पास ढंग के अस्पताल भी नहीं हैं, जो मेडिकल कॉलेज के लिए अनिवार्य शर्त है। मुझे हैरत होती है कि इन कॉलेजों से निकलने वाले डॉक्टर कितने समर्थ होंगे। हमें केंद्र व राज्य सरकारों पर दबाव डालना चाहिए कि वे अधिक से अधिक सरकारी अस्पताल खोलें जिनके साथ मेडिकल कॉलेज भी जुड़ा हो। निजी अस्पतालों से गुरेज नहीं है, किंतु हमें सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और इसे इतना मजबूत बनाना चाहिए कि निजी अस्पतालों को उनसे होड़ लेने में कड़ी मेहनत करनी पड़े और इस प्रकार हमें बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें। जब एक छात्र एमबीबीएस की परीक्षा में बैठता है और उससे डायबिटीज रोग में रोगी को दी जाने वाली दवा का नाम पूछा जाता है तो वह लिखता है-ग्लाइमपीराइड। यह एक साल्ट है, जो डायबिटीज दवा में अकसर दिया जाता है। जब यही छात्र एक डॉक्टर बन जाता है और डायबिटीज का कोई मरीज उसके पास आता है तो वह किसी ब्रांडेड कंपनी की दवा का नाम लिखता है। तो क्या यह डॉक्टर गलत दवा लिख रहा है। नहीं। यह ग्लाइमपेराइड साल्ट से बनी ब्रांडेड दवा होती है। नाम के अलावा इन दोनों दवाओं में क्या अंतर है? ब्रांडेड कंपनी की दस गोलियों की स्टि्रप की कीमत 125 रुपये है, जबकि साल्ट ग्लाइमपेराइड से बनी 10 गोलियों की कीमत महज दो रुपये है। दोनों की गुणवत्ता में कोई अंतर नहीं है। ब्रांड नेम के कारण हमें दस गोलियों के 123 रुपये अधिक देने पड़ते हैं। कुछ और उदाहरण देखिए-जुकाम एक आम बीमारी है। इसके उपचार के लिए बनी दवा में आम तौर पर सेटरीजाइन साल्ट का इस्तेमाल होता है। इस दवा के निर्माण, पैकेजिंग, ढुलाई आदि के बाद अच्छा-खासा मुनाफा कमाते हुए भी इसकी दस गोलियों की कीमत है एक रुपया बीस पैसा, किंतु इसी साल्ट की ब्रांडेड कंपनी की दवा की दस गोलियों की कीमत है 35 रुपये। मलेरिया के रोगी को लगने वाले तीन इंजेक्शनों की कीमत है 25 रुपये। हालांकि इस साल्ट से बने ब्रांडेड इंजेक्शन की कीमत है 300 से 400 रुपये। इसी प्रकार, हैजे की दवा के साल्ट का नाम डोमपेरिडॉन। और इसकी दस गोलियों की कीमत है महज सवा रुपया, जबकि इस साल्ट से बनी ब्रांडेड दवा 33 रुपये में बेची जाती है। इन हालात में गरीब और कुछ हद तक मध्यम वर्ग के लोग भी इन दवाओं को कैसे खरीद सकते हैं? इसका जवाब है जेनरिक दवाएं। इस संबंध में राजस्थान सरकार के प्रयास सराहनीय हैं। वह पूरे प्रदेश में जेनरिक दवाओं को बेचने के लिए दुकानों की स्थापना कर रही है। भारत में मोटे तौर पर करीब 25 फीसदी लोग आर्थिक तंगी के कारण अपनी बीमारियों का इलाज नहीं करा पाते। जरा सोचिए, जेनरिक दवाएं हर भारतीय के लिए कितना बड़ा बदलाव ला सकती हैं। अगर राजस्थान सरकार यह काम कर सकती है तो अन्य राज्यों की सरकारें क्यों नहीं कर सकतीं? जय हिंद! सत्यमेव जयते!

Saturday, May 26, 2012

फिल्‍म समीक्षा : अर्जुन

Review : Arjun: The Warrior Prince 

योद्धा अर्जुन की झलक 

-अजय ब्रह्मात्‍मज

देश में बन रहे एनीमेशन फिल्मों की एक मूलभूत समस्या है कि उनके टार्गेट दर्शकों के रूप में बच्चों का खयाल रखा जाता है। बाल दर्शकों की वजह से उसे प्रेरक, मर्मस्पर्शी और बाल सुलभ संवेदनाओं तक सीमित रखा जाता है। अभी तक अपने देश में एनीमेशन फिल्में पौराणिक और मिथकीय कथाओं की सीमा से बाहर नहीं निकल पा रही हैं। इन्हीं सीमाओं और उद्देश्य के दबाव में अर्जुन तकनीकी रूप से उत्तम होने के बावजूद प्रभाव में सामान्य फिल्म रह जाती है। अर्नव चौधरी और उनकी टीम अवश्य ही संकेत देती है कि वे तकनीकी रूप से दक्ष हैं। एनीमेशन फिल्म को एक लेवल ऊपर ले आए हैं।
अर्जुन में कौरव-पांडव की प्रचलित कथा में से पांडवों के वनवास और अज्ञातवास के अंशों को चुना गया है। पृष्ठभूमि के तौर पर दुर्योधन के द्वेष का चित्रण है। सुशील और कुलीन पांडव दुर्योधन की साजिशों के शिकार होते हैं। संकेत मिलता है कि कृष्ण उनके साथ हैं और वे मुश्किल क्षणों में उनकी मदद भी करते हैं। पांडवों का अज्ञातवास समाप्त होने वाला है। दुर्योधन किसी भी तरह उनकी जानकारी हासिल कर उन्हें फिर से वनवास के लिए भेजना चाहता है। कुरुक्षेत्र के पहले का युद्ध होता है। हमें योद्धा अर्जुन के शक्तिशाली स्वरूप का दर्शन होता है। यह कुरुक्षेत्र की पूर्व कथा है।
लेखक-निर्देशक ने विराट के राजकुमार को अर्जुन की कहानी बताने की युक्ति से मुख्य कथा में प्रवेश किया है। यह युक्ति बनावटी लगती है। वृहन्नला बने अर्जुन खुद ही अपनी कहानी बताते हैं और फिर युद्ध के दौरान अपने वास्तविक रूप में आ जाते हैं। इसके अलावा चरित्रों का रूप और आकार देने में डिज्नी की शैली का निर्वाह किया गया है। चरित्रों का पहनावा भारतीय है, लेकिन उनकी आंखों और देहयष्टि में भारतीय शरीरिक संरचना से अलगाव नजर आता है। शकुनि को गोलमटोल आकार देना भी पारंपरिक धारणा है। तत्कालीन परिवेश को वास्तुकला से उभारने में पर्याप्त कल्पनाशीलता की झलक मिलती है। कुछ दृश्य रोमांचक और अद्भुत हैं।
एनीमेशन में यह सुविधा है कि परिवेश की बारीकियों के साथ पर्दे पर दिखाया जा सकता है। अर्जुन के संवादों में शुद्ध हिंदी का आग्रह अनावश्यक लगता है। आज के शहरी और मल्टीप्लेक्स दर्शकों को उन्हें समझने में दिक्कत हो सकती है। भाषा सहज और बोधगम्य हो तो एनीमेशन फिल्मों का प्रभाव बढ़ जाता है। चरित्रों को दिए गए स्वर उनके स्वभाव के अनुरूप और उपयुक्त हैं। एनीमेशन फिल्मों की परंपरा में अर्जुन निस्संदेह एक कदम आगे है। ग्राफिक्स, एनीमेशन और अन्य तकनीकी मामलों में यह उल्लेखनीय प्रयास है।
*** 1/2 साढे़ तीन स्टार

फिल्‍म समीक्षा : ये खुला आसमान

review : yeh khula aasmaan 

दादु और पोते का अकेलापन 

- अजय ब्रह्मात्‍मज

माता-पिता को इतनी फुर्सत नहीं कि वे अपने बेटे का फोन भी उठा सकें। मां अपनी आध्यात्मिकता और योग में लीन हैं और पिता भौतिकता और भोग में.. नतीजतन हताश बेटा मुंबई से अपने दादु के पास जाता है। गांव में छूट चुके दादु अपनी ड्योढ़ी में कैद हैं। उन्हें अपने बेटे का इंतजार है, जिसने वादा किया था कि वह हर साल उनसे मिलने आया करेगा। आधुनिक भारत के गांवों से उन्नति, भौतिकता और सुख की तलाश में शहरों और विदेशों की तरफ भाग रही पीढ़ी के द्वंद्व और दुख को गीतांजलि सिन्हा ने ये खुला आसमान में चित्रित करने की कोशिश की है।
वह दादु और पोर्ते के अकेलेपन और निराशा को उभारने में माता-पिता की निगेटिव छवि पेश करती हैं। दोनों बाद में सुधर जाते हैं, फिर भी कहानी में फांक रह जाती है। अविनाश (राज टंडन)को अपने माता-पिता(मंजुषा गोडसे-यशपाल शर्मा) से ढाढस और सराहना के शब्द नहीं मिलते। पढ़ाई में अच्छा करने और ज्यादा अंक हासिल करने के दबाव में वह पिछड़ जाता है। आईआईटी की इंट्रेंस परीक्षा पास नहीं कर पाता। अच्छी बात है कि हताशा में भी वह आत्महत्या जैसा शार्टकट नहीं अपनाता।
वह अपने दादु (रघुवीर यादव)के पास लौटता है। दादु उसे बेहतर परफॉर्म करने की प्रेरणा देते हैं। उसे हां और ना की दुविधा से बाहर निकालते हैं। दादु बताते हैं कि पहले सोच-समझ कर कोई फैसला लो और फिर अपने फैसले पर अटल रहो तो कामयाबी अवश्य मिलेगी। अविनाश की जिंदगी पलटती है। गांव की पतंगबाजी से उसके जीत का अभियान शुरू होता है, जो आखिरकार उसे जीवन में सफल बनाता है। अविनाश भी अपने पिता की तरह करिअर के लिए बाहर निकलता है। फर्क यह है कि वह हर साल गांव लौटता है। गांव से छूटने या जुड़े रहने और बेहतर भविष्य के इस द्वंद्व से ऐसा हर परिवार गुजरता है, जिनके पूर्वजों की जड़ें गांव में हैं।
गीतांजलि सिन्हा ने पीढि़यों की सोच के भेद की कहानी को सादगी से पेश किया है। उनके किरदार सहज और आसपास के हैं। शिल्प में सादगी के साथ विश्वसनीयता भी है, जिसे रघुवीर यादव और यशपाल शर्मा जैसे अनुभवी अभिनेताओं ने मजबूत किया है। किशोर उम्र की नई जोड़ी ने अपने किरदारों का उचित निर्वाह किया है। खास कर मुस्कान की भूमिका में आई अन्या आनंद में स्वाभाविकता और मासूमियत है। उनकी कस्बाई प्रतिक्रियाएं और मुद्राएं मनमोहक हैं। अविनाश और मुस्कान की अंतरंगता चौंकाती है। इसके अलावा पतंगबाजी में वैमनस्य दिखाने के लिए सलीम(आदित्य सिद्धू) को मुस्लिम चरित्र गढ़ना अनावश्यक लगता है।
गांव के हिंदू परिवार का हिंदू युवक रहता तो क्या पतंगबाजी में जीत के लिए रची गई दुश्मनी कम हो जाती क्या? दरअसल, चरित्रों की संकल्पना और गठन में यह फिल्मों से बनी प्रचलित धारणा का ही प्रभाव है। फिर भी सलीम के किरदार को आदित्य सिद्धू ने बहुत अच्छी तरह निभाया है। फिल्मों के निगेटिव किरदारों का असर उस युवक के चाल-ढाल में दिखाई पड़ता है। पतंगबाजी के दृश्य में दोहराव और ढीलापन है। कमंटेटर जब बता रहा कि अब तीन पतंग बचे हैं, तब आकाश में दस से ज्यादा पतंग दिख रहे हैं।
बहरहाल, फिल्म का लोकेशन नया और फिल्म के कस्बाई लुक के मेल में है। अगर फिल्म के संवादों में कस्बाई लहजा होता तो विश्वसनीयता और बढ़ती। यशपाल शर्मा का अंग्रेजी उचारण खटकता है। हां, रघुवीर यादव हर तरह से प्रभावित करते हैं।
**1/2 ढाई स्टार

Friday, May 25, 2012

क्यों बौखलाए हुए हैं शाहरुख खान?



-अजय ब्रह्मात्मज
    बाल मनोविज्ञान के विशेषज्ञ ठीक-ठीक बता सकते हैं कि हाल ही में सुहाना के सामने हुई उनके पिता शाहरुख खान और मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन के अधिकारियों के बीच हुई बाताबाती और झड़प का उन पर क्या असर हुआ होगा? जो भी हुआ, उसे दुखद ही कहा जा सकता है। शाहरुख खान की बौखलाहट की वजह है। वे स्वयं बार-बार कह रहे हैं कि उनके बच्चों के साथ कोई दुव्र्यवहार करेगा तो उनकी नाराजगी लाजिमी है। उन्हें अपनी नाराजगी और गुस्से में कही बातों का कोई अफसोस नहीं है। वे उसे उचित ठहराते हैं। उनके समर्थक भी ट्विटर पर ‘आई स्टैंड बाई एसआरके’ की मुहिम चलाने लगे थे। पूरा मामला तिल से ताड़ बना और अगले दिन अखबारों की सुर्खियां बना। समाचार चैनलों पर तो सुबह से खबरें चल रही थीं। मीडिया को बुला कर शाहरुख खान ने अपना पक्ष भी रखा, लेकिन मामले ने तूल पकड़ लिया।
    पूरे मामले में इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि शाहरुख खान ने शराब नहीं पी रखी थी। मानो शराब पीने से ही मामला संगीन बनता है, वर्ना देश का लोकप्रिय स्टार भडक़ कर ‘यहीं गाड़ देने की’ धमकी दे सकता है। आश्चर्य है कि लोकप्रिय स्टार नाराज होने पर कैसी भाषा और कैसे शब्दों का चुनाव करते हैं? किसी भी सभ्य या सुशील व्यक्ति से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह सार्वजनिक तौर पर अभद्र भाषा का इस्तेमाल करे। खास कर अगर वह सेलिब्रिटी है तो उसे विशेष संयम बरतना चाहिए। सार्वजनिक स्थानों पर उनके मुंह से ऐसे शब्दों और गालियों को सुन कर लगता है कि उनकी लोकप्रियता और छवि केवल मुखौटा भर है। उस मुखौटे के पीछे के व्यक्ति का यही सच है कि वह बेसिक इमोशन में आने पर बदजबान हो जाता है।
    दरअसल, भारतीय समाज में फिल्म स्टार का ओहदा इन दिनों काफी बढ़ गया है। उन्हें सामाजिक स्वीकृति मिल चुकी है। उनका हर मोमेंट और मूवमेंट सुविधाओं से सजा होता है। बगैर संवैधानिक प्रावधान के उन्हें प्राथमिकताएं मिलती हैं। उनकी खुशी और सुविधा में सभी बिछे रहते हैं। निश्चित ही वे हमें खुशी देते हैं। उन्हें देखते ही एक सुखद एहसास होता है, जो चंद क्षणों के लिए हमें अपनी वास्तविक दुनिया से निरपेक्ष कर देता है। बिजली की लहर की तरह यह एहसास हमें झंकृत करता है। वास्तव में यह दक्षिण एशियाई सामाजिक परिघटना है। हम अपने स्टारों का पूजते हैं। ऐसे माहौल में कुछ स्टारों का दिल-ओ-दिमाग हिल जाता है। वे स्वयं को सर्वशक्तिमान समझने लगते हैं। उनकी इस सत्ता को कहीं से भी चुनौती मिलती है तो वे बौखला जाते हैं। यह बौखलाहट अकेले शाहरुख खान में नहीं है। वैसे इस संयोग का भी अध्ययन होना चाहिए कि आखिर क्यों शाहरुख ही बार-बार उत्तेजित मुद्राओं में दिख रहे हैं?
    हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में दबी जबान से यह बात कही जाने लगी है कि तीनों खानों (आमिर, सलमान और शाहरुख) में सबसे कमजोर स्थिति शाहरुख खान की है। पिछले दिनों उनकी फिल्में बाकी दोनों खानों की तुलना में कम चली हैं। दर्शकों ने उनकी फिल्मों के प्रति कम उत्सुकता दिखाई है। उनके ड्रीम प्रोजेक्ट ‘रा ़ वन’ से वितरकों-प्रदर्शकों को नुकसान हुआ और दर्शक निराश हुए। कहीं यह पुरानी लोकप्रियता को फिर से हासिल करने और आगे बने रहने की व्याकुलता तो नहीं है, जो बौखलाहट के रूप में बार-बार सामने आ रही है।
    यह कहना लगत होगा कि शाहरुख खान के दिन लद गए। उनकी एक फिल्म हिट होगी और सब कुछ बदल जाएगा। फिर से तारीफें शुरू हो जाएंगी और गुणगान जारी होगा। फिलहाल बाक्स आफिस और बाजार में शाहरुख खान बाकी दोनों खानों से भले ही पीछे नजर आ रहे हैं, लेकिन निर्माता-निर्देशक और दर्शकों का भरोसा उन्होंने नहीं खोया है। सभी इंतजार में है कि उनकी एक फिल्म हिट हो। उम्मीद की जा रही है कि यश चोपड़ा की अगली फिल्म उन्हें फिर से उस स्थान पर ले जाएगी।

Thursday, May 24, 2012

जुझारू अनुराग कश्यप की सफलता

_Y0K3883.JPG_Y0K3744.JPG-अजय ब्रह्मात्‍मज   
फिल्म फेस्टिवल देख कर फिल्मों में आए अनुराग कश्यप के लिए इस से बड़ी खुशी क्या होगी कि उनकी दो खंडों में बनी ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ विश्व के एक प्रतिष्ठित फिल्म फेस्टिवल के लिए चुनी गई है। 16 मई से आरंभ हो रहे कान फिल्म फेस्टिवल के ‘डायरेक्टर फोर्टनाइट’ सेक्शन में उनकी दोनों फिल्में दिखाई जाएंगी। इसके अलावा उनकी प्रोडक्शन कंपनी अनुराग कश्यप फिल्म्स की वासन वाला निर्देशित ‘पेडलर्स’ भी कान फिल्म फेस्टिवल के क्रिटिक वीक्स के लिए चुनी गई है। इस साल चार फिल्मों को कान फिल्म फेस्टिवल में आधिकारिक एंट्री मिली है। चौथी फिल्म अयिाम आहलूवालिया की ‘मिस लवली’ है। इनमें से तीन फिल्मों से अनुराग कश्यप जुड़े हुए हैं। युवा पीढ़ी के सारे निर्देशक अनुराग कश्यप की इस उपलब्धि से खुश है। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गज खामोश हैं। उन्हें लग रहा है कि बाहर से आया दो टके का छोकरा हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का प्रतिनिधित्व कर रहा है।   इस ऊंचाई तक आने में अनुराग कश्यप की कड़ी मेहनत, लगन और एकाग्रता है। ‘सत्या’ से मिली पहचान के बाद अनुराग कश्यप ने पीछे पलट कर नहीं देखा। मुश्किलों और दिक्कतों में कई बार वे ठिठके और कुछ सालों तक एक कदम भी नहीं बढ़ सके। ‘पांच’ के रिलीज न होने पर उनकी निराशा उन्हें अलकोहल और अराजकता की तरफ ले गई। टूटे हारे अनुराग कश्यप में किसी को कोई उम्मीद नहीं दिख रही थी। फिर भी जिद्दी अनुराग कश्यप मानने को तैयार नहीं थे। उन्होंने ‘ब्लैक फ्रायडे’ बनाई। यह फिल्म प्रतिबंधित कर दी गई। अपनी फिल्मों को दर्शकों तक नहीं ले जा पाने केा दुख बढ़ता गया। निराशा और दुख के उस दौर में भी अनुराग की क्रिएटिविटी खत्म नहीं हुई। बहुत कम लोग जानते हैं कि अनुराग कश्यप को बचाए और बनाए रखने में उनके छोटे भाई और ‘दबंग’ के निर्देशक अभिनव कश्यप का बहुत बड़ा हाथ रहा है। भाई के पैशन को देख कर अभिनव ने सारी पारिवारिक जिम्मेदारियां अपने कंधे पर ले लीं। पैसों के लिए टीवी शो और लेखन किया। बड़े भाई को अपने पांव पर खड़े होने और अपने मन की फिल्म बनाने की राह आसान की।   अनुराग की कई खूबियां हैं। वे सीधे और मुंहफट हैं। उन्हें हिपोक्रेसी बिल्कुल पसंद नहीं है। फिल्मों के लिए वे हर समय किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार रहते हैं। तिनका-तिनका जोड़ कर चिडिय़ा अपना घोंसला बनाती है। अनुराग ने छोटी-छोटी कोशिशों से अपनी प्रोडक्शन कंपनी खड़ी की है। इस कंपनी के तहत वे नए फिल्मकारों को मौके दे रहे हैं। उनकी कोशिश रहती है कि प्रतिभाशाली युवा निर्देशकों उनकी तरह भटकना न पड़े। ठोकरें न खानी पडें। उनका दफ्तर अनेक महत्वाकांक्षी निर्देशकों का डेरा और बसेरा बना रहता है। देश की बड़ी संस्थाओं से पढ़ कर आए लडक़े-लड़कियां उनके साथ काम कर रहे हैं। अनुराग की यह विशेषता है कि वे अपने सहयोगियों की ‘वैयक्तिता’ को नहीं दबाते। उनके दफ्तर में खुली आलोचना  की छूट है। नया प्रशिक्षु सहायक भी अनुराग कश्यप के काम पर उंगली उठा सकता है। उसके प्रति कोई दुराग्रह नहीं पाला जाता। अनुराग के करीबी मानते हैं कि अनुराग अपने आलोचकों को अपना सब से करीबी मानते हैं। उन्हें सीने से लगा कर रखते हैं। वे ‘निंदक नियरे राखिये’ के दर्शन में यकीन करते हैं।  ‘देव डी’ और ‘गुलाल’ की लोकप्रियता से अनुराग कश्यप को मेनस्ट्रीम में पहचान मिली। खास कर ‘देव डी’ की सफलता के बाद उम्मीद की जा रही थी कि वे बड़े बजट की मल्टी स्टारर फिल्म शुरू करेंगे। कई कारपोरेट कंपनियों के ऑफर भी थे, लेकिन अनुराग ने पिछली सफलता से खुद को बाहर कर लिया और ‘लो बजट’ में ‘दैट गर्ल इन येलो बूट््स’ का निर्माण और निर्देशन किया। उनके इस सिरफिरे व्यवहार से सभी को ताज्जुब हुआ, लेकिन अनुराग का निरालापन चालू रहा। अनेक युवा निर्देशकों को सीमित बजट की फिल्में देने के साथ वे खुद ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ बनाने निकले। उन्होंने तय किया कि वे इसे दो खंडों में बनाएंगे ताकि पूरी कहानी कही जा सके। कलाकारों और तकनीशियनों की टीम ने उन्हें समर्थन दिया। अभी ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ पोस्ट प्रोडक्शन के अंतिम चरण में है।   ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की अलग कहानी है। एक दिन सईद जीशान कादरी ने अनुराग कश्यप को संक्षेप में एक कहानी सुनाई। कहानी सुनकर वे हतप्रभ रह गए। उन्होंने पूछा, कहीं तुम मुझे उल्लू तो नहीं बना रहे हो। तुम जो बता रहे हो, वह सचमुच कहीं हुआ है क्या? मैंने उस से यही कहा कि तुम कोई प्रूव दो। वह दो दिनों के बाद अखबार की कतरनें लेकर आया, जिसमें पुश्तैनी दुश्मनी और हत्या की खबरें थी। फिर मैंने अपनी टीम को वहां भेजा। उन्होंने आकर बताया कि ऐसी कहानियां वहां हैं। आए दिन ऐसी घटनाएं होती रही हैं। सईद जीशान कादरी के साथ सचिन लाडिया और आखिलेश जायसवाल लेखक के तौर पर जुड़े। फिर स्क्रिप्ट तैयार हुई।  तीन पीढिय़ों के बदले की यह कहानी 60 सालों तक चलती है। अनुराग कश्प इस फिल्म की शूटिंग वास्तविक लोकेशन पर करना चाहते थे। लेकिन लाजिस्टिक दिक्कतों के कारण उन्होंने मिर्जापुर और बनारस के आस पास मुख्य शूटिंग की। वे धनबाद भी गए। वहां के धूसरित परिवेश को अपनी फिल्मों में लेकर लौटे। 60 सालों की कहानी को पीरियड के हिसाब से शूट किया गया है। फिल्म के पहले हिस्से की शूटिंग में उस दौर की फिल्मों का स्टाइल रखा गया है, जबकि आज की कहानी के लिए डिजिटल कैमरे के साथ आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। हिंदी फिल्मों में उत्तरप्रदेश, बिहार और झारखंड को ओरिजनल रंगों में हीं दिखाया गया है। अनुराग ने अपने जमीनी और वास्तविक किरदारों को उनका वास्तविक परिवेश दिया है। कॉस्ट्यूम, भाषा, प्रोपर्टी सभी आवश्यक तत्वों पर पूरा ध्यान दिया गया।   इस फिल्म में मनोज बाजपेयी, पियूष मिश्रा, नवाजुद्दीन सिद्दिकी के साथ तिग्मांशु धूलिया भी प्रभावशाली भूमिका में दिखेंगे। फिल्म के मूल लेखक सईद जीशान कादरी ने भी एक रोल किया है। उन्होंने रोल मिलने की शर्त पर ही अनुराग कश्यप को कहानी दी थी। इस फिल्म में ऋचा चड्ढा और हूमा कुरैशी भी खास भूमिकाओं में हैं। यशपाल शर्मा ने बैंड गायक की अनोखी भूमिका निभायी है। इसके साथ म्यूजिक डायरेक्टर स्नेहा खानवलकर ने परिवेश के हिसाब से इसमें 25 गाने गूंथे हैं। इस फिल्म के लिए शारदा सिन्हा, मनोज तिवारी समेत स्थानीय गायकों और गृहणियों तक से गाने गवाए गए हैं।   ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के दोनों खंडो को ‘डायरेक्टर्स फोर्टनाइट’ सेक्शन में जगह मिलना बड़ी बात है, इसमें पूरे विश्व के वैसे दिग्गज फिल्मकारों की फिल्मों को चुना जाता है, जिनकी अपनी पहचान है। मौलिक, नए और वैयक्तिक पहचान की फिल्मों का यह सेक्शन कान फिल्म फेस्टिवल में विशेष महत्व रखता है। अनुराग कश्यप और उनकी टीम ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ को अंतिम टच देने में लगी है। भारत में यह फिल्म जून-जुलाई में रिलीज होगी।   बनारस से वाया दिल्ली फिल्मों की नगरी मुंबई पहुंचे अनुराग कश्यप की यह व्यक्तिगत उपलब्धि वास्तव में उनकी टीम की मेहनत का नतीजा है। अनुराग कश्यप की कामयाबी युवा फिल्मकारों को प्रेरित कर रही है। वे अपनी पीढ़ी के अगुआ फिल्मकार बन गए हैं।   

Tuesday, May 22, 2012

वक्‍त के साथ लोकगीत बन जाते हैं फिल्‍मी गीत


राज्‍य सभा में जावेद अख्‍तर ने कापीराइट मामले में मार्मिक बातें रखीं। चवननी के पाठकों से इसे शेयर करना जरूरी लगा।
Mr. Vice-Chairman, Sir, I must immediately declare that whatever I speak here will have something to do with this Bill under consideration, which has something to do with the music industry. I work for the music industry. My relationship with music is like a farmer’s relationship with agriculture, or, a lawyer’s relationship with judiciary. So, I hope, it will not be considered as any kind of conflict of interest.
दूसरी बात मैं यह कहना चाहता हूं कि मैं तीन बरस से यह स्‍पीच तैयार कर रहा था, मेरे पास बहुत नोट्स हैं और बहुत मैटीरियल हैं, लेकिन मैंने उसे फेंक दिया, इसलिए कि जब मैं यहां बैठा था और सुन रहा था, तो मुझे लगा कि कुछ और भी बातें हैं, शायद जो बात मैं कह रहा हूं, उससे भी ज्यादा हैं। मैं एक writer हूं, मैं एक lyricist हूं, लेकिन इन तमाम चीजों से पहले मैं एक हिंदुस्‍तानी हूं और जब मुझे मालूम होता है, यह तो 60-65 साल पहले की बात है कि लकीर पुंछ से खींची गयी है, ये तो हिंदुस्‍तानी हैं, जो वहां trapped हैं। ये कौन लोग हैं?
ये आज से 65 साल पहले तो हिंदुस्‍तानी ही थे। ये वहां घिरे हुए हैं। इनमें और अंगोला में जो हिंदुस्‍तानी हैं, उन दोनों में कोई फर्क नहीं है। हमारा फर्ज है कि हम बहुत संजीदगी से इसके बारे में सोचें, लेकिन मुझे यहां जो बातें सुनने को मिलीं, वे एक आदमी के बारे में, एक incident के बारे में सुनने को मिलीं। Incident और आदमी बड़े मामूली होते हैं, पीछे होता है जहन, पीछे होती है ideology, पीछे होती है thinking, पीछे होता है mindset. पाकिस्‍तान का mindset क्या है? आप किस मुल्‍क से मांग रहे हैं कि वह अपनी minority को सही तरीके से ट्रीट करे? जिस मुल्‍क की बुनियादों में ही नफरत डाली गयी है, जो नफरत की वजह से बना है, आप उससे कह रहे हैं आप अपनी minority को ठीक से ट्रीट करिए। अगर वह अपनी minority के साथ सही सुलूक करे, अगर वह हर इंसान को इंसान समझे, अगर वह हर citizen को बराबर का citizen समझे, तो पाकिस्‍तान क्‍यों बनाया था?
मेरा एक शेर है -
मेरी बुनियादों में कोई टेढ़ थी,
अपनी दीवारों को क्या इल्‍जाम दूं?

इसकी बुनियाद में टेढ़ है, आप इसकी दीवारों को सीधा करने के लिए कह रहे हैं, ये कैसे सीधी होगी? ये दीवारें तो टूटेंगी ही, और कुछ नहीं होने वाला। दीवार 1971 में टूटी थी, दीवार फिर टूटेगी। ये बड़ा politically correct statement है “We want a stable Pakistan”. मुझे तो politics में नहीं जाना है, न कोई पार्टी join करनी है, न मुझे किसी का वोट चाहिए। I do not want a stable Pakistan because it is not possible, it is beyond any possibility. जिस चीज पर वह बना है, वह stable हो ही नहीं सकती।
आज बलूचिस्‍तान का जो चीफ है, BLA का जो चीफ है, दो बरस पहले उसने एक स्‍टेटमेंट दिया था, edict जारी किया था कि बलूचसि्‍तान में कोई भी हिंदू, कोई भी क्रशि्चियन, कोई भी पारसी is most welcome, लेकिन कोई भी पंजाबी मुसलमान और कोई उर्दू स्‍पीकिंग मुसलमान यानी मुहाजिर हम यहां accept नहीं करेंगे। That much for the religious identity. आप तो मुसलमान तब तक हैं, जब तक हिंदू हैं। जब हिंदू ही खत्म कर दिये, तो आप शिया हो गये, सुन्नी हो गये, पता नहीं क्या-क्या हो गये? पहले तो सब मुसलमान थे, जब पाकिस्‍तान बन रहा था। फिर अहमदिया नहीं रहे, कादियानी नहीं रहे, अब कहते हैं कि शिया, मुसलमान नहीं हैं। दो रवैये हैं जिंदगी के, एक अपनाने के, दूसरा छोड़ने के। जब आदमी छोड़ने के रास्‍ते पर चलता है, तो छोड़ता ही चला जाता है। उसकी कोई हद नहीं है। यह शेर तो इन्हीं के मुल्‍क के एक बहुत बड़े शायर का है…
तुम्‍हारी तहजीब अपने खंजर से आप ही खुदकुशी करे,
जिस शाखे नाजुक पर आशियाना बनेगा ना पायदार।

जो कमजोर डाली पर आशियाना बनाओगे, तो वह तो गिरने ही वाला है। कमजोर डाली है, मुल्‍क धर्म से नहीं बनते। हमारे मुल्‍क में भी लोगों को सीखना चाहिए कि मुल्‍क धर्म से बनाओगे, तो यह होगा। मुल्‍क बनते हैं कल्‍चर से, मुहब्‍बत से, अपनाइयत से, तमाम चीजें एक-दूसरे से अलग हैं, लेकिन आप जुड़कर रहें, तब मुल्‍क बनता है। मैं फख्र से कहता हूं कि मैं उस मुल्‍क का बाशिंदा हूं कि जिस मुल्‍क में मैं पच्चीस बार आरएसएस के खिलाफ स्‍टेटमेंट दे चुका हूं, लेकिन जब मुझे कॉपीराइट की जरूरत पड़ती है, तो मैं अरुण जेटली साहब के पास जाता हूं और वे मेरी बात सुनते हैं और कहते हैं कि मैं तुम्‍हारी मदद करूंगा। यह है हिंदुस्‍तान!
हिंदुस्‍तान यह है कि मैं आगरा गया और मैंने जब ताजमहल देखा, तो वहां जो पत्तियां बनी थीं, मैंने पूछा कि ये किन लोगों ने बनायी हैं? अब ऐसे लोग क्‍यों नहीं हैं? तो बोले, आइए दिखा देते हैं। हमें ले गये, लड़के एक लाइन से बैठे हुए वहीं संगमरमर की पत्तियां बना रहे थे। मैंने पूछा तो बताया कि गुजरात में एक जैन मंदिर बन रहा है। उनका नाम पूछा तो सब मुसलमान थे। ये है हिंदुस्‍तान! ये क्या करेंगे? इन्‍हें क्या मालूम? ये कुएं के मेंढक हैं, ये वहीं रह जाएंगे। इनका कुछ नहीं होना है। मुझे दुख है, मैं खुशी से नहीं कह रहा हूं।
पाकिस्‍तान में बहुत अच्छे लोग थे। फैज अहमद फैज पाकिस्‍तान के थे और उनकी सोच के बहुत लोग वहां हैं, लेकिन वे minority में हैं, वे कमजोर हैं। उनकी कोई सुनने वाला नहीं है। वहां आम इंसान भी अच्छा है। वह हिंदुस्‍तान की फिल्‍में देखना चाहता है, हिंदुस्‍तान के गाने सुनना चाहता है, हिंदुस्‍तान की इंडस्‍ट्री से impressed है, हिंदुस्‍तान की democracy से impressed है, लेकिन वह कुछ नहीं कर सकता। जिन लोगों के हाथ में ताकत है, जिन लोगों के हाथ में फौज है, जिन लोगों के पास जागीरदारियां हैं और जागीरदारी उन्‍होंने खत्म नहीं कीं, वह लूट बाकी है। जब एक समाज में लूट रहे हों, जहां human rights न हों, जहां equality नहीं हो, तो उसे कवर करने के लिए आपको एक philosophy चाहिए होती है और वह philosophy उन्‍होंने अपने मजहब की अख्तियार की, जिसके नीचे दरअसल economic exploitation है। जिसके नीचे इंसान पर जुल्‍म है, कभी इस बहाने, कभी उस बहाने। आपने एक minority का जिक्र किया, मैं जानता हूं कि वहां ईसाई minority के साथ क्या हो रहा है? तो आप यह सोचें, जरूर आप यह स्‍टेटमेंट दे दीजिए कि आपके Ambassador जाएंगे, वे आएंगे, बात कर लेंगे।
इतिहास का पहिया खुद चलता है। अगर Ambassadors फैसले करके दुनिया बदल सकते तो क्या बात थी। यह वक्‍त का पहिया है और वक्‍त का पहिया गलत स्‍ट्रक्‍चर को तोड़ता है, तो आप इंतजार कीजिए।
अब आइए वापस आते हैं, जिस मुसीबत में मैं हूं और हमारे हजारों लोग हैं।
सर, बड़े जमाने से ये तकलीफें थीं, लेकिन शायद हिंदुस्‍तान के कलाकार समझते थे कि बोलेंगे, तो सुनने वाला कौन है? लेकिन अब वक्‍त बदल रहा है, लोग बदल रहे हैं, हालात बदल रहे हैं। उम्‍मीद करता हूं कि कानून भी बदलेगा और हिंदुस्‍तान के कलाकारों की किस्‍मत भी बदलेगी। तो आज इस यकीन से उनके बारे में बोल रहा हूं कि इस किनारे से उस किनारे तक इस सदन में जितने लोग हैं, वे मेरी बात पूरे ध्यान से सुन रहे हैं, पूरे दिल से सुन रहे हैं और अगर बात हिंदुस्‍तान के संगीतकारों और गीतकारों की है, तो ऐसा ही होना चाहिए, इसलिए कि यह मुल्‍क, यह धरती गीतकारों और संगीतकारों की है। यह बात मैं इसलिए नहीं कह रहा हूं कि सुनने में अच्छी लगती है, बल्कि यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि सच्ची है। दुनिया में कौन सा दूसरा मुल्‍क है, जहां एक मुल्‍क में classical परंपरा की दो traditions सैकड़ों साल पुरानी हैं – हिंदुस्‍तानी और कणार्टक। दुनिया में कौन सा ऐसा मुल्‍क है जहां लोक संगीत के इंद्रधनुष में इतने रंग हों, जितने यहां हैं? कश्‍मीर से कन्याकुमारी तक जाकर देख लीजिए, महाराष्‍ट्र से मणपिुर तक जाकर देख लीजिए, क्या-क्या रंग हैं म्‍यूजिक में? दुनिया में कौन सा ऐसा मुल्‍क है, जहां पवति्र ग्रंथ में भी शायरों का नाम और काम मिलता है? हमारे गुरु ग्रंथ साहबि, हमारे रामचरतिमानस में “रघुकुल रीति सदा चलि आई, प्राण जाइ पर वचन न जाई” – राजा दशरथ रानी कैकेयी से यह महाकवि तुलसीदास के शब्‍दों में कहते हैं। दुनिया में कहां ऐसा मुल्‍क है, जहां जन्म से लेकर मरण तक कोई जगह नहीं, कोई पल नहीं, कोई क्षण नहीं, जिस पर सैकड़ों गीत न हों? वह एहसास की कोई मंजिल हो, वह भावना की कोई रुत हो, वह ख्याल का कोई रंग हो, आपको सैकड़ों गीत मिल जाएंगे।
फिर हमारे फिल्‍मी गीत हैं, जो रिलीज होते हैं, तो फिल्‍मी गीत हैं, लेकिन कुछ दिनों के बाद वे लोकगीत बन जाते हैं। वक्‍त की छलनी से सब कुछ बह जाता है – एक्टर का चेहरा, फिल्‍म का नाम – और वह अमर गीत रह जाता है, जो आपके अतीत का, आपकी यादों का हसि्‍सा बन जाता है। आज आपके कानों में जब कोई पुराना गीत गूंजता है, तो ऐसा लगता है जैसे लड़कपन के किसी दोस्‍त ने कंधे पर हाथ रख दिया हो और कह रहा हो, बैठो, कहां जा रहे हो, बात करो। यादों का मेला लग जाता है। यह गीत कहां सुना था, कब सुना था, किसके साथ सुना था और कभी-कभी यह भी याद आता है कि किसके लिए सुना था। हैरत होती है और हैरत से ज्यादा गम होता है कि जिस मुल्‍क में संगीत के और शायरी के इतने चिराग रोशन हों, उनके नीचे देखिए तो अंधेरा ही अंधेरा है। जिस अंधेरे में हिंदुस्‍तान के राइटर्स और म्‍यूजिशियंस की जिंदगी बरसों से लाचार और बेबस भटक रही है। लेकिन दिल में एक उम्‍मीद है कि एक दिन आएगा, जब हमारी सुनी जाएगी। एक दिन आएगा जब हमें इंसाफ मिलेगा, एक दिन आएगा जब हमें हमारा अधिकार मिलेगा।
“आएगा आने वाला” बहुत मशहूर गीत था। साठ साल से ज्यादा पुराना गीत है। यह गीत कंपोज किया था, पंडित खेमचंद प्रकाश ने, जो अपने जमाने के बहुत बड़े संगीत विद्वान थे। पिछले दिनों एक अजीब वाकया हुआ। सर, जब एक गाना रिकॉर्ड होता है तो उसमें दो रॉयल्‍टीज जेनरेट होती हैं, एक साउंड रिकॉर्डिंग रॉयल्‍टी कहलाती है जो साउंड रिकॉर्डिंग का मालिक है, प्रोड्यूसर या म्‍यूजिक कंपनी, उसके लिए होती है और एक परफॉर्मिंग होती है जो राइटर और म्‍यूजिशियन के लिए होती है। यहां पर भी यह कानून है – यह अभी नहीं आ रहा है, यह कानून पहले से है – और बाहर भी है। बाहर जरा थोड़ा सा अलग है, वहां सचमुच राइटर और म्‍यूजिशियन को पैसा दे देते हैं। वहां पर कहीं 13-14 हजार रुपये खेमचंद प्रकाश जी के अकांउट में इस गाने के लिए जमा हो गये। वह पैसा यहां भेजा गया। खेमचंद प्रकाश जी तो इस दुनिया में नहीं हैं। जब ढूंढ़ा गया तो उनकी पत्नी मलाड में स्‍टेशन पर भीख मांगती हुई मिल गयीं। यह कोई बहुत हैरत की बात नहीं है, ऐसी बहुत सी कहानियां हैं।
इसी तरह ओपी नैयर साहब थे। मुझे याद है, मैं तब छोटा सा था तो एक फिल्‍म आयी थी – “मुजरिम”, जिसमें शम्‍मी कपूर और पद्मिनी हीरो-हीरोइन थे। उसके पोस्‍टर पर हीरो-हीरोइन की तस्‍वीर नहीं थी बल्कि हारमोनियम लिए ओपी नैयर साहब खड़े थे – सुर के जादूगर, ओपी नैयर। वे ओपी नैयर मुंबई के बाहर नाला सुपारा नाम की एक छोटी सी बस्‍ती है, वहां पर अपनी आखिरी उम्र में एक फैन के घर में छोटे से कमरे में रहे थे और होम्‍योपैथी के इलाज से उन्‍होंने अपनी जिंदगी गुजारी, जबकि उनके सैकड़ों गाने बजते रहे और उसकी रॉयल्‍टी म्‍यूजिक कंपनीज लेती रहीं।
इसी तरह से मजरूह, शैलेंद्र, गुलाम मोहम्‍मद – आपको कितने नाम बताऊं, जिन लोगों ने क्या-क्या कांट्रीब्‍यूट किया है? शैलेंद्र जैसा गीतकार क्या कभी फिर पैदा होगा? क्या बर्बाद ख़ती है? क्‍यों, क्या वजह है? अगर हमारे यहां भी रॉयल्‍टी की इजाजत है, हमारे यहां भी रॉयल्‍टी का कानून है … (व्‍यवधान) … इन शहीदों की बड़ी लंबी लसि्‍ट है, किस-किसका नाम लें? “नाम किस-किस के गिनाऊं, तुझे याद आये।” इसकी क्या वजह है? इसके मुकाबले में दूसरी तरफ चलिए।
69-70 में बीटल्‍स की टीम टूट गयी थी। पिछले साल सिर्फ Paul Mccartney को, जिसने अपनी जिंदगी में 27 गाने लिखे, 16 मिलियन डॉलर गाना लिखने की रॉयल्‍टी मिली है। Elton John, जिसने पांच साल से कोई रिकॉर्ड नहीं बनाया, पिछले साल उसे 22 मिलियन डॉलर्स रॉयल्‍टी मिली है।
हमारे यहां जो रॉयल्‍टी का सिस्‍टम है, हमारे यहां आईपीआरएस है, Indian Performance Rights Society है, आप ही की दुनिया से जमा भी की जाती है। यह कहां चली जाती है? आप इजाजत दें तो मैं एक छोटा सा पैराग्राफ आपको पढ़कर सुनाता हूं। यह एक compulsory move है, जो हर कांट्रैक्‍ट में, वह चाहे भारत रत्न पंडित रवि शंकर के लिए हो या दो ऑस्‍कर के विनर एआर रहमान के लिए हो या मेरे जैसे मामूली आदमी या गुलजार के लिए हो, यह कंडिशन उसमें होती है।
“The rights assigned, included but not restricted to the rights of mechanical, digital, reproduction, in any manner or format or media whether existing or future, publication, broadcasting, reproducing, hiring, granting, translation, adaption, synchronization, making and used in a cinematographic film, performing in public, publishing in any other way, whole or part of the literary work, the rights to grant the mechanical and reproduction, publication, sound and television, broadcasting, transmission over the airways, electronically or through satellite or literary works.” Now, here the plot thickens. ‘Including all forms of communication, transmission, reproduction and exploitation of the literary work that may be discovered or invented in the future. The said work has been assigned by me for good and valuable consideration.’
यह bonded labour नहीं तो क्या है? सिर्फ अंग्रेजी में लिख दिया, है तो bonded labour और इसके ऊपर किसने शिकायत की? भारत रत्न रो रहा है। भारत रत्न मंत्री जी को, LoP को और प्राइम मिनिस्‍टर को लेटर लिख रहा है कि साहब ये रॉयल्‍टी का चेंज करा दीजिए। अगर एआर रहमान और पंडित रवि शंकर को यह शिकायत है, तो बाकियों की हालात सोचिए क्या होगी?
इससे भी ज्यादा एक शर्म की बात यह है कि यह कांट्रेक्ट सिर्फ हिंदुस्‍तानी देसी कंपनियां ही साइन नहीं करवातीं हैं, बल्कि जो जापान की हैं, जो जर्मनी की हैं, जो अमेरिका की हैं, इनकी हिम्‍मत नहीं हो सकती कि जापान में, जर्मनी में या अमेरिका में किसी फनकार को, किसी कलाकार को यह कहें कि इस पर साइन कर दो। क्या फर्क है इनमें और ईस्‍ट इंडिया कंपनी में और क्या फर्क है उन हिंदुस्‍तानी कंपनियों में और मीर जाफर में, जो इनके साथ मिल कर काम कर रही हैं। हमारे कलाकार से, किस-किस से, मैं आपको नाम सुनाऊंगा, ये सिर्फ फिल्‍म की एक प्राब्‍लम नहीं है, हरेक की है। आप इन्‍हें जलील कर रहे हैं और ये सिर्फ पैसे के लिए बात नहीं है, जब इतनी grip होती है, र्माकेटिंग इतनी strong हो जाए, तो creativity pays.
मुझे पिछले दिनों शिव कुमार शर्मा जी मिले, हमें proud होना चाहिए कि हमारे पास एक ऐसा फनकार है, ऐसा कलाकार है। उन्‍हें एक म्‍युजिक कंपनी ने बुलाया। उनसे कहने लगे, देखिए, हम आपका ऐड बनाते हैं, आपका क्या है, आप शुरू बड़ा धीरे-धीरे करते हैं। वह end में जो तेज होता है न, आप उससे शुरू कीजिए, folk चलेगा। यह म्‍यूजिक कंपनी वाला शिव कुमार शर्मा को बता रहा है। उन्‍होंने कहा साहब, मेरे मोहल्‍ले में एक बैंड है, बारातों में जाता है, उसका ऐड बना लीजिए। मुझे माफ करना। एक बार मेरे साथ वाकिया हो चुका है।
एक म्‍युजिक सिटी में था, म्‍युजिक कंपनी के मालिक आ गये। मैंने सोचा शायद मेरे फैन होंगे, सुनने आये हैं मैंने क्या लिखा है। उन्‍होंने मुझे सुना और कहने लगे कि आपने पहली लाइन में एक वर्ड “रूठना” लिखा है, आप यह वर्ड निकाल दीजिए। मैंने कहा, क्‍यों? वे बोले आजकल यह वर्ड चलता नहीं है। मैंने कहा कि कहां नहीं चलता है, बोले नहीं, नहीं। मैंने उन्‍हें कई गाने सुनाये, जिनमें “रूठना” वर्ड आया। उन्‍होंने कहा कि कभी होगा, यह वर्ड आप निकाल दीजिए। मैंने कहा कि भाई, अगर आपको इस तरह से काम करना है, तो मैं तो कर नहीं सकता हूं, आप किसी और को ले लीजिए। वह मेरी बड़ी इज्जत करता था। अगले ही दिन मेरी बात मान गया और किसी और को ले लिया, मुझे निकाल दिया।
जो लोग इस बिल के खिलाफ हैं, वे क्या करें? वे कहते हैं कि देखिए, आपने तो गाना लिखा, किसी ने म्‍युजिक दिया, एक प्रोड्यूसर ने बड़ा पैसा खर्च करके उसे तैयार किया, उस प्रोड्यूसर ने उस गाने को बड़े-बड़े स्‍टार्स पर, बड़ी अजीब-अजीब लोकेशन पर जाकर पिक्चराइज किया, उसमें बड़े-बड़े शॉट डाले, बड़े-बड़े विजुअल डाले, ये सब किस काम के लिए किया, फिल्‍म के लिए किया। ये फिल्‍म प्रोड्यूसर है, यह म्‍युजिक प्रोड्यूसर नहीं है। इसे यह गाना फिल्‍म के लिए चाहिए, यह गाना वह फिल्‍म के लिए record करता है। हम तो फिल्‍म से कुछ नहीं मांग रहे हैं। तुम्‍हारी फिल्‍म सुपरहिट हो जाए, तुम जानो, न चले तुम जानो, हमारा उससे कोई रिश्‍ता नहीं है। फिल्‍म बड़ी से बड़ी हिट हो जाए, मैंने बहुत सुपरहिट फिल्‍में लिखी हैं, मेरे पास तो कोई प्रोड्यूसर आया नहीं कि हजूर, आपने तो शोले लिख दी, दीवार लिख दी, त्रिशूल लिख दी, ये लीजिए, खुशी से आपके लिए लाया हूं, हमने तो नहीं देखा। ये तो पिक्चर के लिए था, हमने पैसा ले लिया, अब आपकी किस्‍मत, आप कैसी पिक्चर बनाते हैं, हम तो उसके लिए जिम्‍मेदार नहीं हैं। अगर हिट है, तो भी आपकी क्रेडिट और फ्लाप है तो भी आपकी क्रेडिट। जब आप इसमें से निकालते हैं और दूसरी जगह इस्‍तेमाल करते हैं, तो वहां भी जो रॉयल्‍टी होती है, जरा देखिए, सरकार ने कानून बनाया था कि वह 50 फीसदी जाएगी आर्टिस्‍टों को और 50 फीसदी हमें जाएगी। हम लोगों ने वहां पर कहा कि नहीं। अचानक ऐसी बात होगी, तो यह अच्छा नहीं लगेगा। आप 75 फीसदी उन्‍हें दे दीजिए और हमारे कहने पर चेंज किया गया, यह शराफत हमारी थी। मगर उनकी शराफत यह है कि उन्‍हें 99 नहीं चाहिए, उन्‍हें 100 चाहिए। यह तो दूसरी जगहों से आ रहा है, अगर यहां भी उनका हक है तो एक काम कीजिए। एक आदमी एक फिल्‍म बनाता है, उसमें शाहरूख खान हीरो है, पिक्चर चली, नहीं चली, कोई बात नहीं, मैं उसमें से चार शॉट निकाल कर, मैं प्रिंट का मालिक हूं, एक ब्‍यूटी के ऐड में इस्‍तेमाल कर लेता हूं। मुझे इसका हक है। वह कहेगा कि मैंने यह शॉट तो फिल्‍म के लिए दिया था, आपने ब्‍यूटी की ऐड में कैसे इस्‍तेमाल कर लिया?
यही मेरा सवाल है कि जहां हमने फिल्‍म के लिए दिया था, वहां हम कोई क्लेम नहीं कर रहे हैं। जब आप उसे फिल्‍म से निकाल कर इस्‍तेमाल करते हैं, तब भी हम कहते हैं आप 75 परसेंट ले लो और आप को साढ़े बारह परसेंट देने में तकलीफ है। यह तो लालच की बात है, बहुत छोटी बात है। एक साहब गुप्‍ता जी हैं, कहने लगे कि साहब यह तो होगा कि आप एलाऊ नहीं करेंगे, आप सारी रॉयल्‍टी ले लेना। यहां इसमें copyright एसाइनमेंट बैन नहीं है। यह सिर्फ discipline किया गया है कि आप उनसे इतनी रॉयल्‍टी नहीं ले सकते या आप नहीं दे सकते। यह पाबंदी प्रोड्यूसर्स पर नहीं है, म्‍यूजिक कंपनीज पर नहीं है, यह पाबंदी तो हम पर है, आर्टिस्‍ट्स पर है, राइटर्स पर है। लेकिन शिकायत उन लोगों को है, हम लोगों को शिकायत नहीं है। हिंदुस्‍तान के सारे कलाकार अपोजिशन की ओर तथा सरकार की ओर हाथ जोड़ रहे हैं कि प्‍लीज इसे 25 परसेंट बोनाफाइड करवा दीजिए। आप इसमें से 75 परसेंट ले रहे हैं, फिर आपको और क्या चाहिए? मगर कहते हैं कि कांट्रेक्‍ट पर हिंड्रेंस है। अच्छा, minimum wages legislation भी कांट्रेक्‍ट पर हिंड्रेंस है? आज हम जहां दिल्‍ली में खड़े हैं, यहां एग्रीक्लचर में skilled labour भी 328 रुपये से कम में काम नहीं कर सकता और unskilled labour 270 रुपये से कम में काम नहीं कर सकता। वे कह रहे हैं कि साहब, मैं डेढ़ सौ रुपये में करने को तैयार हूं। उन लोगों के लिए तो hindrance of contract हो गया।
Dowry Prohibition Act क्या है? एक आदमी है और उसकी बेटी है, वह डावरी देने को तैयार है। उसकी बेटी डावरी के लिए तैयार है, लड़का डावरी लेने के लिए तैयार है और लड़के का बाप भी खुश है। सरकार को क्या एतराज है? सरकार को एतराज यह है कि उसे मालूम है कि यह इक्वल फैसला नहीं हो रहा है, यह मजबूर है। हमें इसको रोकना पड़ेगा। child labour में क्या गड़बड़ है? जो Child Labour (Prohibition and Regulation) Act है, वह क्या है? अरे भाई, मां-बाप अपने बच्‍चों से काम करवाने को तैयार हैं, बच्चा तैयार है और कारखाने वाला भी तैयार है। हमें मालूम है कि यह तैयारी किस हालत में होती है। यह भी देखिए कि पिछले बीस बरस में स्‍टैंडिंग कमेटी ने कहा कि हमें एक कांट्रेक्‍ट लाकर दो, जिसमें राइटर्स ने अपनी पब्लिशिंग राइट तुम्‍हें नहीं दिये। वे नहीं ला सकते, इसलिए है ही नहीं। ये bounded labour हैं। उसके बाद हमदर्दी भी है, कह रहे हैं कि अगर उसको जरूरत पड़ गयी, अचानक सब देखना चाहे, तो आपने तो उसका हाथ बांध दिया। मैं श्री एनके सिंह जी की इजाजत से शेक्सपियर को कोट करना चाहूंगा। मैं समझता हूं कि यहां कम से कम इस हाउस में उनके पास copyright है। …
यह पता नहीं किसका नजरिया है, जब मेरी बारी आयी तो पर्दा गिरा दिया। सर, मैं सिर्फ चार या पाचं मिनट और लूंगा। “It is time to fear when tyrants kiss”. जब जालिम हमदर्दी करे तो डरने का वक्‍त है। जब म्‍यूजिक कंपनीज कह रही हैं कि बेचारे राइटर का क्या होगा अगर इसके बाद ये राइट नहीं हुए तो? इसके खिलाफ कौन लोग हैं, जो खास जनों से कहते हैं कि भाई, यह मत कीजिएगा। आप जरा उनके नाम सुन लीजिए। सारे नाम तो बहुत ज्यादा हैं, मैं सारे नाम तो नहीं बता सकता, लेकिन कुछ नाम अवश्‍य बता देता हूं, पं रवि शंकर, पं शिव कुमार शर्मा, पं हरिप्रसाद चौरसिया, शोभा मुदगल, विशाल भारद्वाज, गुलजार, प्रसून जोशी, जगजीत सिंह, अमजद अली खान, अमान अली खान और अयान अली खान। रवि जी, तो इंतजार में ही चले गये, जगजीत सिंह भी इंतजार में ही चले गये, इनके भी सिग्नेचर हैं। विशाल शेखर … (व्‍यवधान) … वे तो टेलेंटेड थे। इनमें और भी बहुत से नाम हैं। फिल्‍म इंडस्‍ट्री के सारे नाम तो हैं ही, कलाकारों के भी नाम हैं। इनमें जाकिर का नाम है, इनका नाम है, साउथ के सारे बड़े सिंगर्स का नाम है, एआर रहमान का नाम है, बंगाल के सारे बड़े सिंगर्स और म्‍युजिशियंस का नाम है। ये लोग कहते हैं इसको कर दीजिए। क्‍यों भई? अच्छा, एक बात और है, ये कहते हैं कर दीजिए, लेकिन यह पुराने पर नहीं होना चाहिए। यह बात किसी हद तक सही है, किसी हद तक सही नहीं है। मतलब, यदि यह बिल आ जाए और आप कल को यह कहें कि मेरा गाना 1960 से रिलीज हुआ था, आप मुझे उसका हिसाब बताइए, तो यह बेकार बात है, क्‍योंकि कोई भी लॉ रेट्रोस्‍पेक्टिव में नहीं लग सकता है। ऐसा कानून है कि अगर अब वह गाना बजेगा, तो उसकी रॉयल्‍टी होगी, तब, उस वक्‍त, आपने जो कर दिया, वह कर दिया, आप उसको भूल जाइए, हम भी भूल जाएंगे, इसलिए जब तक यह नहीं होता, यही एक तरीका है, क्‍योंकि सारे म्‍युजिशियंस, सारे राइटर्स गलत नहीं हो सकते हैं।
एक तरफ ये हैं और दूसरी तरफ ये मल्‍टीनेशनल्‍स हैं, बड़े-बड़े प्रोड्यूसर्स हैं, जो pretend कर रहे हैं कि प्रोड्यूसर्स का बहुत नुकसान है। दरअसल जो अप फ्रंट मनी होती है, वह तो केवल दस, बारह प्रोड्यूसर्स को मिलती है, बाकियों को एक नया पैसा तक नहीं मिलता है। जब यह बिल आएगा, तब पहली बार उन छोटे प्रोड्यूसर्स को पैसा मिलेगा, वह इसलिए क्‍योंकि पब्लिशिंग हमारे हाथ में होगी और वह पब्लिश होगा, वरना म्‍युजिक कंपनियां सब ले जाती हैं, उसे बेच देती हैं। 90 परसेंट प्रोड्यूसर्स को इससे फायदा ही होना है और सच तो यह है कि 10 परसेंट, जो यह समझ रहे हैं कि उनका नुकसान होगा, उनको भी फायदा ही होगा, क्‍योंकि वे जितने में बेचते हैं, वह कम है। लेकिन जब तक यह बिल पास नहीं होगा, तब तक यह जुल्‍म, यह सितम, यह लूट चलती ही रहेगी। यह एक अंधेरा है, जिसमें हम चल रहे हैं। मुझे वह शेर याद आता है कि…
सियाह रात, नहीं नाम लेती ढलने का,
यही तो वक्‍त है, सूरज तेरे निकलने का

इसलिए यह बिल आज पास होना चाहिए। शुक्रिया।