वी शांताराम भारत के उन फिल्मकारों की श्रेणी में हैं, जिनकी फिल्मों ने हमेशा सामाजिक संदेश दिए। वह चाहे 'आदमी' हो या 'पड़ोसी', 'दहेज' हो या 'दुनिया न माने' या फिर 'अमृत मंथन' हो या 'अमर ज्योति' और 'नवरंग'। उनकी फिल्मों में अपराधियों का हृदय परिवर्तन होता है, वेश्याओं का पुनर्वसन होता है, सांप्रदायिक सद्भाव का माहौल तैयार होता है, दहेज-प्रथा बेनकाब होती है। वी शांताराम वैसे भाग्यशाली फिल्मकार रहे, जिन्होंने जीते जी अपनी अमरता का स्वाद चख लिया। उनकी सारी फिल्में हिट रहीं और हर फिल्म को मील का पत्थर माना जाता है।
ऐसी ही फिल्मों में एक फिल्म थी 'झनक झनक पायल बाजे'। 1955 में बनी यह फिल्म हालांकि कहानी की दृष्टि से कुछ कमजोर थी, मगर संगीत-नृत्य इसकी जान थी। सुप्रसिद्ध र्नतक गोपीकृष्ण के जीवन की यह एक अद्भुत फिल्म बन गई। वह प्रमुख भूमिका में थे। इस फिल्म को न केवल सर्वश्रेष्ठ फिल्म, सर्वोत्तम निर्देशन तथा सर्वोत्तम कला निर्देशन का फिल्मफेयर अवार्ड मिला, बल्कि राष्ट्रपति का रजत पुरस्कार भी हासिल हुआ।
शांताराम की

हर फिल्म उनकी ड्रीम प्रोजेक्ट होती थी, मगर 'झनक झनक पायल बाजे' के निर्माण के समय सफलता, विफलता का जो भय मन में सवार हो गया था, वह रिलीज होने के बाद ही दूर हुआ। तब उन्होंने कहा था, 'इस फिल्म का निमार्ण मेरा स्वप्न था, जिसे मैंने तन, मन, धन को पूरी तरह दांव पर लगाकर पूरा किया। अगर यह दर्शकों को पसंद नहीं आती तो मैं पूरी तरह बर्बाद हो गया होता।' इसकी सफलता को इस रूप में भी आंका जा सकता है कि मुंबई के मेट्रो सिनेमाघर में लगने वाली यह पहली हिंदी फिल्म थी।
इस फिल्म को शांताराम ने टेक्नीकलर में बनाने की योजना पहले ही तैयार कर ली थी। लेकिन इसके लिए काफी पैसे चाहिए थे। उस चुनौती को उन्होंने स्वीकार किया तथा इसके लिए पूरे उपकरण विदेशों से मंगवाकर अपने स्टूडियो में लगवाए थे। मगर तकनीशियन सभी भारतीय ही थे, जिन्होंने अपने परिश्रम और प्रतिभा से इस फिल्म को आश्चर्यजनक बना दिया। इसी फिल्म से नृत्य निर्देशक नामक तत्व का भी जन्म हुआ। इसके पहले उनकी कोई पहचान नहीं बनी थी। जी बालकृष्ण ने अपने कैमरे के सारे प्रयोग कर दिखाए। नृत्य निर्देशक स्वयं गोपीकृष्ण थे। पटकथा और संवाद दीवान शरर ने लिखे थे। गीत हसरत जयपुरी के थे तथा संगीत दिया था वसंत देसाई ने। कला निर्देशन किया था कनु देसाई ने। संपादक थे चिंतामन बोरकर, कलाकार थे - गोपीकृष्ण, संध्या, के दाते, मदन पुरी, मनोरमा, चंद्रकांत, मुमताज बेगम, चौबे महाराज, नाना पलसीकर, निवालकर, चमन पुरी और भगवान। राजकमल कला मंदिर की इस फिल्म के निर्देशक वी शांताराम थे।
इस फिल्म को आज भी भारतीय कला और संस्कृति के प्रतीक के रूप में देखा जा

ता है। इसकी कहानी भगवान शंकर के दरबार से शुरू होती है, जहां 'भरत नटराज' की सर्वोच्च उपाधि के प्रयास होते हैं। इसलिए कि शंकर को नृत्य कला का अधिष्ठाता माना गया है। यानी नटेश्वर हैं वह। मंगल महारा (के दाते) को 'भरत नटराज' की उपाधि हासिल है। यह उनके वंश की परंपरा बन गई है कि भारत के इस शीर्ष पुरस्कार को प्राप्त करें। चूंकि वह बूढ़े हो गए हैं, इसलिए उनकी इच्छा और सपना है कि इस उपाधि को उनका लड़का गिरधर (गोपीकृष्ण) धारण करे। वह अपने बेटे को उस योग्य बनाने लगते हैं। लेकिन मंगल महाराज की यह समस्या है कि वह कठोर अनुशासन में विश्वास करते हैं तथा विचार के स्तर पर पुरातनपंथी हैं। कला-साधना के बीच न तो हल्केपन को बर्दाश्त करते हैं और न ही गलतियों को।
गिरधर भी पिता की तरह तेजस्वी नर्तक हैं। एक दिन वह भी नीला (संध्या) नामक युवती को सस्ते और उत्तेजक नृत्य करते हुए देख लेते हैं। गिरधर इसके लिए नीला को डांटते भी हैं। मगर नीला बहुत अहंकारी लड़की है। वह गिरधर से नृत्य पर बहस कर बैठती हैं। गिरधर उन्हें जब नृत्य के कुछ भाव दिखाते हैं तो नीला को मान होता है कि उन्हें तो बहुत कुछ सीखना बाकी है। यहीं गिरधर की योग्यता में नीला की जिज्ञासा का प्रवेश हो जाता है। यानी एक रोमांटिक ट्रैक तैयार हो जाता है। नीला तब मंगल महाराज से प्रार्थना करती है कि वे उन्हें अपनी शिष्या बना लें। मंगल महाराज की साधना और साधक की कठोरता संबंधी सारी शर्तों को वह मान लेती हैं। मंगल महाराज उनके समर्पण और दृढ़ता को देखकर 'भरत नटराज' की प्रतियोगिता में गिरधर की नृत्य-सहयोगी बनने की स्वीकृति भी दे देते हैं।
गिरधर और नीला-दोनों की साधना के बीच प्रेम पनपने लगता है, जबकि मंगल महाराज के वंश में साधना के दौरान प्रेम के प्रवेश को हमेशा वर्जित माना जाता रहा है। भरत नटराज की उपाधि के बाद ही विवाह का अधिकार दिया जाता है। गिरधर उस मान्य परंपरा के खिलाफ खड़े होते दिख रहे हैं। इस बीच उस कहानी में मनी बाबू (मदन पूरी) यानी खलनायक का प्रवेश होता है। मनी बाबू काफी पैसे वाला है, जो नीला को मन ही मन प्यार करता है। नीला और गिरधर का साथ उसे परेशान करता रहता है। वह मंगल महाराज के कान भरने में सफल हो जाता है। मंगल महाराज छड़ी फेंकते हैं, जिससे गिरधर जख्मी हो जाते हैं। गिरधर के चेहरे पर दुख और पीड़ा के भाव उभरते हें, जिसे मंगल महाराज देखकर द्रवित हो जाते हैं। वह ईश्वर से अपने लिए क्षमा तथा गिरधर के लिए कला के प्रति सच्ची लगन पैदा करने का वरदान मांगते हैं। लेकिन गिरधर धीरे-धीरे नीला के मोहजाल में धंसते चले जाते हैं। इससे उनकी साधना में गतिरोध आने लग जाता है।
इस बीच मंगल महाराज महाशिव रात्रि के उत्सव में भाग लेने वाराणसी चले जाते हैं। लौटने पर पाते हैं कि दोनों साधना की बजाए प्रेमालाप में लीन हो गए हैं। तब वह वाराणसी से लाए घुंघरू और परंपरा से मौजूद वस्त्र को देकर गिरधर को वंश के सम्मान की रक्षा की याद दिलाते हैं। वह आग्रह करते हैं कि एक लड़की के प्यार के चक्कर में पड़कर अपने कर्तव्य को भूलने की कोशिश मत करो। उनके समझाने का कोई असर नहीं होता है। वह एक दिन दोनों को रोमांटिक मूड में देख लेते हैं। तब मंगल महाराज चतुराई से

काम लेते हुए विश्वामित्र और मेनका प्रसंग पर नृत्य की तैयारी कराते हैं कि किस तरह मेनका ने विश्वामित्र की वर्षों की तपस्या को भंग कर दी थी। तब नीला को समझ में आता है कि उन्हें इंगित करके ही यह नाट्य तैयार कराया गया है। गिरधर पिता की इस रणनीति का विरोध करते हैं, जबकि नीला सोचने लगती है कि उनके कारण ही गिरधर की साधना भंग हो रही है। गिरधर के मन में नफरत पैदा करने के लिए नीला अचानक मनी बाबू के साथ चली जाती हैं। फिर वह उन्हें छोड़कर नदी में कूद जाती हैं। लेकिन भाग्य से एक साधु (नाना पलसीकर) बचा लेते हैं। मंगल महाराज, गिरधर को लेकर कहीं और चले जाते हैं। वह अपनी भूतपूर्व शिष्या रूपकला (चंद्रकला) को उत्सव में साथ नृत्य करने के लिए तैयार करते हैं। इस बीच नीला को उनकी नौकारानी देख लेती है। मनी बाबू भी उन्हें ढूंढ़ लेते हैं। मगर नीला का प्रण है कि जब तक गिरधर 'भरत महाराज' की उपाधि नहीं पा जाते, तब तक कोई भी फैसला अपने बारे में नहीं कर सकतीं। मनी बाबू भी कसम लेता है कि गिरधर को कभी भी वह उपाधि नहीं लेने देगा।
समय का चक्र ऐसा चलता है कि गिरधर की मुलाकात नीला से हो जाती है। वह नीला को साथ चलने के लिए कहते हैं। जब वह तैयार नहीं होतीं तो गिरधर उनकी हत्या पर उतर आते हैं। तभी मंगल महाराज वहां पहुंच जाते हैं। नीला वहां से चली जाती हैं।
काफी समय बाद 'भरत नटराज' उत्सव का दृश्य आता है। एकल नृत्य में गिरधर सबको पराजित कर देते हैं। लेकिन अंतिम दिन गिरधर को रूपकला के साथ तांडव नृत्य करना है। मनी बाबू अपनी चाल के तहत रूपकला को लालच देकर फोड़ लेता है। वह भाग जाती हैं। गिरधर परेशान हो जाते हैं। तभी नीला मंच पर उपस्थित होती हैं। गिरधर का क्रोध और बढ़ जाता है। वह त्रिशूल से उन पर हमला कर देते हैं। त्रिशूल को मंगल महाराज अपने हाथ पर झेल लेते हैं। हाथ लहूलुहान हो जाता है। नीला पर आया गुस्सा, तांडव में बदल जाता है। गिरधर 'भरत महाराज' की उपाधि के हकदार बन जाते हैं। मनी बाबू अपनी हार स्वीकार कर लेता है तथा मंगल महाराज नीला का हाथ मांगकर गिरधर के हाथों में पकड़ा देते हैं। फिल्म यहीं खत्म हो जाती है। भारत की कलात्मक फिल्मों में इसकी गिनती शीर्ष पर की जाती है।
गोपीकृष्ण ने अपनी वास्तविक नृत्य-प्रतिभा का जमकर प्रदर्शन किया, जो दर्शकों को आज भी याद है। नृत्य की अधिकांश शूटिंग मैसूर के वृंदावन गार्डन में की गई थी। जी बालकृष्ण की फोटोग्राफी ने प्रकृति और नृत्य के सौंदर्य को बखूबी कैद किया था। बालकृष्ण भारत के पहले सिनेमेटोग्राफर हैं, जिन्हें टेक्नीकलर में छायांकन करने का गौरव प्राप्त हुआ।
फिल्म में ग्यारह गीत हैं। सात गीत हसरत जयपुरी के हैं, जबकि दो गीत दीवान शरर ने लिखे हैं। एक गीत के रचियता सरस्वती कुमार दीपक हैं, जबकि एक मीराबाई का गीत लिया गया है। सच तो यह है कि इस फिल्म को सुपरहिट करने में गीत-संगीत ने जबर्दस्त भूमिका निभाई थी। 'नैन सो नैन नाहि मिलाओ...' और 'सैयां जाओ जाओ मोसे ना बोलो...' अमर गीतों में शामिल हो चुके हैं।