chavanni chap (चवन्नी चैप)

maza aayega...padhte rahen

Sunday, November 29, 2009

दरअसल : हिंदी फिल्‍मों में आतंकवाद

-अजय ब्रह्मात्‍मज

26/11 से छह दिन पहले रिलीज हुई कुर्बान के लिए इससे बेहतर वक्त नहीं हो सकता था। सभी पत्र-पत्रिकाओं और समाचार चैनलों पर 26/11 के संदर्भ में आतंकवाद पर कवरेज चल रहा है। पाठक और दर्शक उद्वेलित नहीं हैं, लेकिन वे ऐसी खबरों को थोड़े ध्यान और रुचि से देखते हैं। कुर्बान के प्रचार में निर्देशक रेंसिल डिसिल्वा ने स्पष्ट तौर पर आतंकवाद का जिक्र किया और अपनी फिल्म को सिर्फ प्रेम कहानी तक सीमित नहीं रखा। कुर्बान आतंकवाद पर अभी तक आई फिल्मों से एक कदम आगे बढ़ती है। वह बताती है कि मुसलिम आतंकवाद को आरंभ में अमेरिका ने बढ़ाया और अब अपने लाभ के लिए आतंकवाद समाप्त करने की आड़ में मुसलिम देशों में प्रवेश कर रहा है। मुसलमान अपने साथ हुई ज्यादतियों का बदला लेने के लिए आतंकवाद की राह चुन रहे हैं।

हिंदी फिल्मों के लेखक-निर्देशक मनोरंजन के मामले में किसी से पीछे नहीं हैं, लेकिन सामाजिक और राजनीतिक फिल्मों में उनकी विचारशून्यता जाहिर हो जाती है। लेखक-निर्देशकों में एक भ्रम है कि उनका अपना कोई पक्ष नहीं होना चाहिए। उन्हें अपनी राय नहीं रखनी चाहिए, जबकि बेहतर लेखन और निर्देशन की प्राथमिक शर्त वैचारिक स्पष्टता होनी चाहिए।

पुराने फार्मूलों के प्रभावशाली इस्तेमाल के लिए ज्यादा कल्पनाशील और विचारवान होना जरूरी है। हिंदी फिल्मों में इन दिनों कल्पना और विचार की कमी खल रही है। करण जौहर सरीखे निर्देशक फिल्म को सजाने और उसकी पैकेजिंग पर ज्यादा ध्यान देते हैं। लुक, स्टाइल, पोस्टर, प्रचार आदि पर जितना खर्च किया जाता है, उसका दस प्रतिशत भी लेखन और शोध पर खर्च किया जाए, तो फिल्मों की क्वालिटी में फर्क नजर आएगा। कुर्बान का ही उदाहरण लें, तो इसके साथ आतंकवाद की समझ रखने वाले विद्वानों का लेखन में सहयोग लिया गया होता, तो फिल्म ज्यादा असरकारी होती।

एहसान खान का फिल्म के अंत में बदलना उसकेबदलाव की वजह कोई विचारधारा नहीं है। चूंकिउसकी बीवी गर्भवती है, इसलिए वह अपनी बीवी को बचाना चाहता है। इसे कुछ लोग विचार पर भावना की जीत मान सकते हैं, किंतु ऐसी भावुकता स्थायी नहीं होती।

भारत की सीमाओं के अंदर चल रही आतंकवादी गतिविधियों से हमारा जीवन प्रभावित हो रहा है। फिर भी हमारे फिल्मकारों का ध्यान विदेशों में अटका हुआ है। अगर कुर्बान के एहसान और अवंतिका भारत में ही रहते, तो हम ज्यादा करीब से आतंकवाद को समझ पाते।

सही है कि भारतीय संदर्भ लेना या भारतीय परिवेश में फिल्म बनाना सहज नहीं रह गया है। देश के किसी भी कोने में कोई उठ खड़ा होता है और फिल्म के खिलाफ फतवा जारी कर देता है। फिल्म के किसी दृश्य, संवाद और गीत पर आपत्ति करता है। ऐसे मौकों पर देश की लोकतांत्रिक सरकार लाचार नजर आती है। निर्माता का आर्थिक नुकसान होता है। लिहाजा आतंकवाद जैसी महत्वपूर्ण विषय वाली फिल्में देश के बाहर ही शूट की जाती हैं और उनके रेफरेंस भी विदेशी रखे जाते हैं। ऐसी फिल्मों से थोड़ा-बहुत मनोरंजन तो होता है, लेकिन गंभीरता का भ्रम बना रहता है। दरअसल, ऐसी फिल्में दर्शकों के लिए अधिक उपयोगी नहीं होतीं।


Saturday, November 28, 2009

फिल्‍म समीक्षा : दे दना दन

-अजय ब्रह्मात्‍मज

प्रियदर्शन अपनी फिल्मों का निर्देशन नहीं करते। वे फिल्मांकन करते हैं। ऐसा लगता है कि वे अपने एक्टरों को स्क्रिप्ट समझाने के बाद छोड़ देते हैं। कैमरा ऑन होने के बाद एक्टर अपने हिसाब से दिए गए किरदारों को निभाने की कोशिश करते हैं। उनकी फिल्मों के अंत में जो कंफ्यूजन रहता है, उसमें सीन की बागडोर एक्टरों के हाथों में ही रहती है। अन्यथा दे दना दन के क्लाइमेक्स सीन को कैसे निर्देशित किया जा सकता है? दे दना दन प्रियदर्शन की अन्य कामेडी फिल्मों के ही समान है। शिल्प, प्रस्तुति और निर्वाह में भिन्नता नहीं के बराबर है। हां, इस बार किरदारों की संख्या बढ़ गई है।

फिल्म के हीरो अक्षय कुमार और सुनील शेट्टी हैं। उनकी हीरोइनें कट्रीना कैफ और समीरा रेड्डी है। इन चारों के अलावा लगभग दो दर्जन कैरेक्टर आर्टिस्ट हैं। यह एक तरह से कैरेक्टर आर्टिस्टों की फिल्म है। वे कंफ्यूजन बढ़ाते हैं और उस कंफ्यूजन में खुद उलझते जाते हैं। फिल्म नितिन बंकर और राम मिश्रा की गरीबी, फटेहाली और गधा मजदूरी से शुरू होती है। दोनों अमीर होने की बचकानी कोशिश में एक होटल में ठहरते हैं, जहां पहले से ही कुछ लोग आकर ठहरे हैं। इंटरवल तक आते-आते सारे किरदार आपस में इस कदर उलझ जाते हैं कि कहानी का सिरा गायब हो जाता है। लेखक-निर्देशक चाहते भी नहीं कि दर्शकों के दिमाग में कोई कहानी या उसकी उम्मीद बची रहे। इंटरवल के बाद हीरो-हीरोइन और कैरेक्टर आर्टिस्ट एक लेवल पर गड्डमड्ड हो जाते हैं। सब बराबर हो जाते हैं।

सुस्त चाल में आरंभ हुई फिल्म इंटरवल के बाद रफ्तार पकड़ती है। रफ्तार पकड़ते ही गलतफहमी, छीनाझपटी, छींटाकशी, मसखरी, साजिश, बेवकूफी और बेसिर-पैर की हरकतें आरंभ हो जाती हैं। बीच-बीच में कुछ प्रचलित मुहावरे संवाद के तौर पर सुनाई पड़ते हैं। हम किरदारों की चीखों से खीझते हैं, लेकिन फिर उनकी नादानी और परेशानी पर हमें हंसी आती है। फिल्म हंसाती है और कुछ दृश्यों में कुछ ज्यादा ही हंसाती है। गलती से आप अपनी हंसी की वजह सोचने लगे तो एहसास होता है कि आप प्रियदर्शन की फूहड़ता में शामिल हो चुके हैं। लतीफेबाजों की महफिल में बैठ चुके हैं, जहां हंसना स्वाभाविक धर्म है। हम इसलिए हंस रहे हैं कि लोग हंस रहे हैं। लोग इसलिए हंस रहे हैं कि हम हंस रहे हैं।

दे दना दन में नारी और पैसों को लेकर जबरदस्त कंफ्यूजन है। प्रियदर्शन की कामेडी फिल्में मर्दवादी होती हैं और खुलेआम औरतों का मखौल उड़ाती हैं। परफार्मेस की बात करें तो इस फिल्म को राजपाल यादव, जानी लीवर और असरानी ने संभाला है। चौथा नाम अर्चना पूरण का लिया जा सकता है। कट्रीना कैफ, समीरा रेड्डी और नेहा धूपिया का चुनाव परफार्मेस के लिए नहीं, बल्कि प्रदर्शन के लिए किया गया है। अक्षय कुमार और सुनील शेट्टी हीरों हैं, क्योंकि वे हीरोइनों के साथ गाने गाते हैं। दे दना दन बताती है कि हम कामेडी फिल्मों को लेकर कितने कैजुअल हो चुके हैं। एक सवाल है कि क्या बगैर चीखे-चिल्लाए कामेडी फिल्मों के संवाद नहीं बोले जा सकते?

**1/2 ढाई स्टार


Tuesday, November 24, 2009

एहसास : विवाह को नया रूप देंगे युवा-महेश भट्ट

तुमने विवाह जैसी पवित्र संस्था को नष्ट कर दिया है। क्या तुम अवैध संबंध को उचित बता कर उसे अपनी पीढी की जीवनशैली बनाना चाहते हो? तुम्हारी फिल्म विकृत है। क्या तुम यह कहना चाहते हो कि दो पुरुष और एक स्त्री किसी कारण से साथ हो जाते हैं तो दोनों पुरुष स्त्री के साथ शारीरिक संबंध रख सकते हैं? एक वरिष्ठ सदस्य ने मुझे डांटा। वे फिल्म इंडस्ट्री की सेल्फ सेंसरशिप कमेटी के अध्यक्ष थे। यह कमेटी उन फिल्मों को देख रही थी, जिन्हें सेंसर बोर्ड ने विकृत माना या सार्वजनिक प्रदर्शन के लायक नहीं समझा था।

विवाह की पवित्र धारणा

मैंने पर्दे पर वही दिखाया है, जो मैंने जिंदगी में देखा-सुना है। ईमानदारी से कह रहा हूं कि मैं कभी ऐसी स्थिति में फंस गया तो मुझे ऐसे संबंध से गुरेज नहीं होगा, मैंने अपना पक्ष रखा। कौन कहता है कि सत्य की जीत होती है? मेरी स्पष्टवादिता का उल्टा असर हुआ। मेरी फिल्म को प्रतिबंधित कर दिया गया। यह 35 साल पहले 1978 की बात है। मेरी उम्र 22 साल थी और मैंने पहली फीचर फिल्म मंजिलें और भी हैं पूरी की थी।

मुझे समझने में थोडा वक्त लगा कि विवाह हिंदी फिल्मों का अधिकेंद्र है, क्योंकि वह भारतीय जीवन का अधिकेंद्र है। हमारे पूर्वजों ने इसे समझ लिया था कि मनुष्य जाति पति-पत्नी पर पूर्ण नियंत्रण चाहती है। उन्होंने इस भावना का ख्याल रखते हुए उसे विवाह के रूप में सांस्कृतिक वैधानिकता दे दी। भारतीय संस्कृति में विवाह एक जन्म का ही नहीं, सात जन्मों का बंधन होता है। हालांकि सभी धर्मो में विवाह को पवित्र माना गया है, लेकिन भारत में इसका खास महत्व है। यही कारण है कि भारतीय फिल्मों में विवाह का चित्रण इतनी भव्यता के साथ किया जाता है। विवाह के प्रति भारत का दृष्टिकोण किसी और मुद्दे से अधिक उसे दुनिया के किसी और देश से अलग करता है। हम भारतीय सेक्स और तलाक की बातें करने में अतिरिक्त तौर पर शर्मीले हो सकते हैं, लेकिन हमारी संस्कृति में हर व्यक्ति विवाह के बारे में ईमानदारी से बातें करता है। भारतीय संस्कृति में विवाह सबसे महत्वपूर्ण संस्था है।

विवाह का सिनेमाई महिमामंडन

फिल्मों में हर पीढी के निर्देशकों ने विवाह को पर्दे पर प्रमुखता दी है। मैंने महसूस किया कि अधिकतर ने विवाह संस्था को बचाने और दिखाने की अपनी विशेष भाषा विकसित कर ली है। कोई भी पर्दे पर उसका मखौल उडाता नजर नहीं आता।

बचपन की यादों में फिल्मों की वे छवियां हैं, जब हीरो-हीरोइन सज-धज कर विवाह मंडप में जाते थे और पवित्र अग्नि के फेरे लेकर पति-पत्नी हो जाते थे। उनके मां-पिता और दूसरे लोग उन पर फूल बरसाते हुए खुशी से रोते नजर आते और पर्दे पर दि एंड का कार्ड आता था। फिल्म के खलनायक और खलनायिका इस समारोह को रोकने की हर कोशिश करते थे। कई फिल्मों में खलनायक भाडे की औरत को मंडप में भेजता था। वह वहां जाकर चिल्लाती थी और घोषणा करती थी कि उसके गर्भ में हीरो का बच्चा पल रहा है। मंडप में हंगामा हो जाता था। बाद में हीरो बडी तरकीब से खलनायक के दुष्ट इरादे उजागर करता था।

क्लासिक हिंदी फिल्म मदर इंडिया में बिरजू

विवाह मंडप से ही सूदखोर साहूकार की बेटी को अगवा करता है। इस दुराचार के लिए उसे अपनी मां की गोलियों का निशाना बनना पडता है, क्योंकि उसने विवाह की पवित्रता को भंग किया था। मुगले आजम काल्पनिक कहानी है, लेकिन इसमें अकबर किसी भी सूरत में कनीज अनारकली की शादी अपने बेटे सलीम से नहीं होने देना चाहते।

युवा फिल्म निर्माता भले ही दावा करते रहे हैं किउनकी प्रस्तुति व कथा पहले के फिल्मकारों से भिन्न है, लेकिन यदि सफल निर्देशकों की फिल्मों पर गौर करें तो पाएंगे कि उन्होंने फिल्मों में विवाह को ही अलंकृत किया है। सूरज बडजात्या की हम आपके हैं कौन या विवाह और आदित्य चोपडा की दिल वाले दुलहनिया ले जाएंगे श्रेष्ठ उदाहरण हैं।

बदलाव के स्वर

वैश्वीकरण की प्रक्रिया आरंभ होने के बाद भारत में तेजी से बदलाव आया है। इसी के परिप्रेक्ष्य में रुपहले पर्दे पर विवाह के चित्रण में भी बदलाव आरंभ हो गया है। मेरी दो फिल्मों जिस्म और मर्डर में दो ऐसी भारतीय औरतों का चित्रण था, जो बहुत बोल्ड और मुखर हैं। इन फिल्मों की कामयाबी के बाद माना गया कि अब विवाह के पुराने मॉडल को छोडने का वक्त आ गया है, जिसमें फिल्म का अंत विवाह में होता है। हालांकि स्थायी संबंधों की खोज पर्दे पर चालू रहेगी, लेकिन आने वाले समय में आप पाएंगे कि विवाह बंधन में बंधे बगैर ही वे ऐसे स्थायी संबंध बना रहे हैं।

विवाह पर बनी मेरी सबसे महत्वपूर्ण फिल्म अर्थ थी। इसमें मैंने परवीन बाबी के साथ अपने संबंधों को चित्रित किया था। फिल्म हिट हुई। उससे यह धारणा खत्म हो गई कि केवल बुरे व्यक्ति सेक्स का आनंद उठाते हैं, अच्छे व्यक्ति महज प्यार करते हैं। फिल्म की सफलता की वजह यह थी कि वह मेरे निजी अनुभवों पर आधारित थी और उसे मैंने पूरी ईमानदारी के साथ बनाने का साहस दिखाया था। पच्चीस सालों के बाद भी वह अंतरंग सिनेमा की मिसाल और भारत में विवाह पर भारत की आधिकारिक टिप्पणी मानी जाती है।

सच्चाई को स्वीकारना होगा

जब भी कोई फिल्मकार फिल्म बनाता है तो उसकी जिंदगी या जिंदगी के उसके अनुभव फिल्म में आ ही जाते हैं। नौवें दशक में विवाह संस्था हिली हुई थी। हिंदी फिल्मों में इसकी पवित्रता का चित्रण तो होता था, लेकिन फिल्मकार खुद अनैतिक जिंदगी जी रहे थे। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भी बदलाव दिखने लगा था। कबीर बेदी और प्रोतिमा बेदी तथा मैं और परवीन बाबी खुलेआम अपनी जिंदगी जी रहे थे और अपने रिश्तों को लेकर साहसी व ईमानदार थे। तब हमें विपथगामी समझा गया था। आज वैसी जिंदगी महानगरों में कई लोग जी रहे हैं। लेकिन अभी भी शुद्धतावादी लोग परंपरा पर जोर देते हैं और मानते हैं कि पश्चिम के प्रभाव से विवाह संस्था डगमगा जरूर गई है, लेकिन वह बनी रहेगी और फिल्मों में उसकी पवित्रता और महत्ता का चित्रण होता रहेगा।

वे गलत सोच रहे हैं। 1992 के आर्थिक सुधार कार्यक्रमों के आरंभ और समाजवादी विकास के सोवियत मॉडल के खत्म होने के बाद भारत और हिंदी फिल्मों में तेजी से बदलाव आया है। जब भी समाज नई राह पर चलता है, सामाजिक उतार-चढाव आते हैं और उसकी वजह से सेक्स और नैतिकता के प्रति हमारे दृष्टिकोण में बदलाव आता है। भारत में यही हुआ है। आज का समाज बिलकुल अलग है। यह पाखंडी और छद्मी नहीं है, जो कहे कुछ और लेकिन जिए किसी और ढंग से। 21वीं सदी में भारतीय समाज, विशेषकर शहरी समाज जिंदगी के कुरूप और अंधेरे पहलुओं के प्रति अधिक संवेदनशील और जागरूक हो गया है। हमारी विनोदप्रियता बढी है। हमें दोहरी जिंदगी का एहसास हो चुका है। अब हम पहले की तरह नहीं जीना चाहते। आज कॉमेडी फिल्मों में विवाह का खूब मखौल उडाया जा रहा है और उसकी पवित्रता को निशाना बनाया जा रहा है। फिल्मों और आम जीवन का फर्क पुरातनपंथी और परंपरा के पैरोकार कहेंगे कि भारत की महान संस्कृति में अवैध संबंधों का वायरस पश्चिमी समाज और सिनेमा के प्रभाव से आया है। उसकी वजह से विवाह में दरारें दिख रही हैं। लेकिन देश के जानकार युवा मेरी तरह ही मानते हैं कि अवैध संबंध मानव मात्र के स्वभाव में है। युवा अधिक समझदार, पारदर्शी और स्पष्ट हैं। भारत की आधी आबादी युवा है। यही भारतीय समाज और सिनेमा में विवाह को नया रूप देगी।

आम लोगों को अच्छी तरह समझना चाहिए कि वे हिंदी फिल्मों के अमीर और मशहूर व्यक्तियों की जिंदगी अपनाएंगे तो उन्हें भारी कीमत चुकानी पड सकती है। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री एक चहारदीवारी में है, जहां हम अपनी मर्जी से जी लेते हैं। आम लोग ऐसी जिंदगी नहीं जी सकते। हमारी लोकप्रियता, ताकत और चमक-दमक हमारी रक्षा करती है। हम पर कोई आक्रमण नहीं कर पाता।साधारण इंसान अवैध संबंध जीने की कोशिश करेगा तो उसे संस्कृति के नाम पर जला दिया जाएगा। विवाह एक उद्योग बन चुका है और यह खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए हर प्रयत्न करेगा। सिनेमा उसके लिए सबसे उपयुक्त माध्यम है।

संक्षेप में चीजें जितनी तेजी से बदलती हैं, उतनी ही एक जैसी रहती हैं। अगर आप विवाह संस्था से टकराएंगे तो आपको वही भुगतना पडेगा जो 35 साल पहले मुझे भुगतना पडा था। इसलिए, कृपया सावधान हो जाएं।


Monday, November 23, 2009

हिंदी टाकीज द्वितीय : फिल्मों ने ही मुझे बिगाड़ा-बनाया-कुमार विजय


हिंदी टाकीज द्वितीय-2

बनारस के हैं कुमार विजय। उन्‍होंने लगभग तीन दशक पूर्व नाटकों और फिल्मों पर समीक्षाएं लिखने के साथ स्वतंत्र लेखन की शुरुआत की। बाद में नियमित पत्रकारिता से जुड़ाव हुआ। धर्मयुग, दिनमान आदि पत्रिकाओं तथा अनेक पत्र-पत्रिकाओं के लिए नियमित लेखन करते रहे। एक अरसे तक दैनिक आज और हिन्दुस्तान के संपादकीय विभाग से संबद्धता भी रही। हिन्दुस्तान के वाराणसी संस्करण में फीचर संपादन किया। केबल चैनलों की शुरुआत के दौर में तीन वर्षों तक जीटीवी के सिटी चैनल की वाराणसी इकाई के लिए प्रोडक्शन इंचार्ज के रूप में कार्यक्रमों का निर्माण भी किया। संप्रति एक दैनिक पत्र के संपादकीय विभाग से संबद्ध हैं। साहित्य के पठन-पाठन में उनकी गहरी रुचि है।

जीवन के पचास वसंत पूरे करने के बाद अचानक अपने फिल्मी चस्के के बारे में याद करना वाकई एक मुश्किल और तकलीफ देह काम है। अव्वल तो लम्बे समय का गैप है, दूसरे लम्बे समय से फिल्मों से अनकन्सर्ड हो जाने वाली स्थित रही है। इस सफर में सिनेमा ने काफी परिवर्तन भी देखा है। न सिर्फ फिल्में महंगी हुई हैं फिल्में देखना भी महंगा हुआ है। मल्टीप्लेक्स का जमाना है।

यूं तो पहली फिल्म शायद एक फूल दो मालीदेखी थी, ममेरे-मौसेरे भाइयों के साथ उनके स्कूल में। बचपन के दिनों में देखी इस ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म के बारे में सिर्फ इतना याद है कि बनारस के रामायणबाग स्थित खेदन लाल राष्‍ट्रीय इंटर कालेज के मैदान में शाम को इसे दिखाया गया था और किस्मत के खेल निराले मेरे भइया शायद इसी फिल्म का गीत है। हो सकता है ऐसा न भी हो सिर्फ स्मृति में ऐसा टंका हो! ठसके बाद एकाध भोजपुरी और हिन्दी फिल्में और देखी थी, एक दूसरे ममेरे भाई के साथ, जो बीएचयू हास्टल में रह कर पढ़ते थे और कभी-कभार शहर आते रहते थे। भोजपुरी वाली फिल्म शायद भौजीथी, जिसकी हीरोइन कुमकुम थीं और इसमें उस दौर का बहुत लोकप्रिय गीत था, जिसका एक बोल था - 'जइसे अमवा के मोजरा से रस चुएला...'। हिन्दी वाली फिल्म शायद धूल का फूलथी। इसका एक गीत जुबान पर काफी चढ़ा था कि वफा कर रहा हूं वफा चाहता हूं, जिसके जवाब में नायिका के हिस्से की पंक्ति थी, बड़े बेवफा हो ये क्या चाहते हो।

किशोर वय से युवावस्था की दहलीज पर पहुंचते -पहुंचते तो फिर फिल्में देखना शौक और फैशन दोनों बन चुका था। कुछ तो शहर के मध्य में रिहाइश होने के कारण और कुछ इस उम्र में नये बनते मित्रों का भी इसमें योगदान था। उस दौर में मुहल्ले के दोस्तों में से एक अनिल धवन का फैन था तो दूसरा कुत्ते मैं तेरा खून पी जाउंगा यानी धर्मेंन्द्र का दीवाना। हालत यह थी कि कई बार यह तय करना मुश्किल हो जाता कि फूल और पत्थरदेखी जाय कि दो बदन। दोनों अपनी अपनी जिद में आ जायं तो फिर शशि कपूर, संजीव कुमार या फिर विनोद मेहरा की कोई फिल्म देखी जाती। इस दौर में प्रकाश टाकीज, भागीरथी, मजदा, प्राची, निशात, फिल्मिस्तान चित्रा, केसीएम आदि सिनेमाघरों में कई फिल्में देखी गईं। 'आ गले लग जा', 'चोर मचाए शोर', 'रोटी', 'अजनबी' और न जाने कौन कोन सी फिल्में देखी। उस दौर में सिनेमा देखने का मतलब इस लिहाज से ज्यादा संतोश दायक लगता था कि पहली बार शायद इससे घर और स्कूल कॉलेज के दायरे से बाहर हमें एक स्वतंत्र और वयस्क आईडेंटिटी मिलती थी।

इस दौर में बनारस शहर में सिनेमा हाल बहुत थे, जिनमें कई खस्ताहाल और पुराने थे। फिल्में भी इनमें पुरानी ही लगती थीं। कई बार दिलचस्पी नहीं होने पर भी इनमें फिल्में देखना हो जाता था क्योंकि भाई लोग तुले होते थे। धर्मेन्द्र के प्रशंसक महोदय तो धर्मेन्द्र और दारा सिंह तक की कोई फिल्म छोड़ना ही नहीं चाहते थे। इतना ही नहीं रोजाना सुबह शाम रियाज करके बॉडी भी बनाते और हेयर स्टाइल भी सेट कराते। कहने का मतलब यह कि इस दौर में हम अपने को फिल्मी नायकों की तरह देखने लगे थे। इस दौर के सबसे बड़े और लोकप्रिय सितारे राजेश खन्ना थे। लगभग हर युवा इनकी हेयर स्टाइल वेलबाटम पैंट और उसपर छोटी आस्तीन के कुर्ते का दीवाना था। जिसे देखो सामने से तिरछी मांग पीछे की ओर किये इतराता फिरता था। लगभग इन्हीं दिनों अमिताभ बच्चन की 'आनंद' और 'अभिमान', 'गहरी चाल', 'सौदागर' और 'जंजीर' आदि फिल्में भी आयी थीं। कहने का मतलब ये कि 'जंजीर' की सफलता हमारे शहर के युवाओं को तब के लंबू के रूप में एक नया आईकॉन मिल चुका था, जो बीच से मांग निकालता था। जल्दी ही यह हेयर सटाइल भी उसी तरह लोकप्रिय हो गयी थी जैसे कभी राजेश की थी। मेरे भी पुराने फोटोग्राफ इसी हेयर स्टाइल में मिलेंगे। साथ ही यह राजेश खन्ना शर्मीला टैगोर के अमर प्रेम और हेमा मालिनी के साथ प्रेम नगर का जमाना था तो तो मनोज कुमार के 'रोटी कपड़ा और मकान', 'दस नंबरी' आदि फिल्मों का भी जमाना था। याद है पहले दिन पहला शो देखने के चक्कर में उन दिनों अक्सर सिनेमाघरों पर मारपीट तक हो जाती थी।

उन्नीस सौ पचहत्तर से अस्सी के बीच का यह दौर शहर में नये- नये सिनेमाघरों के खुलने का भी दौर था। गुंजन, विजया, सरस्वती, पद्यश्री, नटराज, साजन आदि सिनेमाधर खुल रहे थे। इनका शुभारंभ भी अक्सर नई फिल्मों से ही होता था। यह अलग बात है कि आज इनमें से अनेक सिनेमाघर बंद हो चुके हैं। रमेश सिप्पी की मल्टी स्टैरर शोले के साथ ओपेन हुए साजन की चर्चा भी उसी तरह होती थी, जैसे गब्बर के संवादों की। क्योंकि तब के दर्शकों में सिनेमाघरों की खूबियों खामियों का भी एक आकर्शण होता था, और यह अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त सिनेमा घर था।

नया सिनेमा और छोटे बजट की फिल्मों का दौर भी शुरू हो चुका था। ये फिल्में टैक्सफ्री होती थीं जिनकी टिकट दर भी सामान्य होती। चित्रा में मृणाल सेन की भुवन शोमतो विजया में कादम्बरी, पद्यश्री में निशांत, भूमिका, मंथन, आदि फिल्में देखने को मिलीं। उन दिनों बनारस में वाराणसी सिने सोसाइटी नामक एक फिल्म सोसाइटी भी चलती थी। मणिकौल की दुविधामैंने यहीं देखी। बुलानाले के चित्रा और अस्सी स्थित भारती, जिसे अब अभय नाम से जाना जाता है, में उन दिनों संडे की सुबह अंग्रेजी फिल्मों के शो चलते थे, जिसके दर्शकों में निकट होने के कारण बीएचयू के अध्यापकों रिसर्च स्कालर्स की बहुलता होती थी। इस शो का अपन जैसे नये मुल्लाओं के लिए खास अर्थ होता था। इन्हीं दिनों सरस्वती में सत्यजीत राय कि फिल्मों एक सप्ताह व्यापी समारोह भी आयोजित हुआ, जिसमें 'पाथेर पांचाली', 'अपराजितो' और 'अपूर संसार' के साथ 'नायक' और 'चारुलता' दिखायी गयी थी। बनारस में बांग्लाभाशियों की उल्लेखनीय आबादी के चलते ऐसे आयोजन होते रहते थे। सत्यजीत राय और दूसरे बांगला फिल्मकारों की फिल्में भी समय समय पर प्रदर्शित होती थीं।

कहने का मतलब यह कि इस दौर तक आते आते मेंरे लिए सिनेमा का मतलब बदल चुका था। फिल्में देखना सिर्फ मनोरंजन या वक्तकटी का साधन नहीं रह गया था, बल्कि उसमें एक अलग तरह की दिलचस्पी बन रही थी।

सिनेमा के आकर्षण के चलते नाटकों में भी दिलचस्पी पैदा हो गई। घीरे-धीरे आकर्षण बढ़ता ही गया। याद करूं तो बनारस में उन दिनों बन रही भोजपुरी की दूसरे दौर की फिल्मों में कभी दंगलकी शूटिंग देखने हरहुआ जा रहा हूं तो कभी धरती मैया की यूनिट के साथ चोलापुर ब्लाक के कमौली में डेरा पड़ा है। शूटिंग से लौटकर शाम को फिर होटल में यूनिट के नायक नायिकाओं और अन्य लोगों से जान-पहचान और उसके जरिए फिल्मी ज्ञान बढ़ाया जा रहा है। ऐसी मुहिमों पर अक्सर मेरे मित्र, जो उन दिनों बीएचयू के दृश्य कला संकाय में पेंटिंग के छात्र थे, और सुगम संगीत की प्रख्यात गायिका स्व बागेश्वरी देवी के पुत्र अक्सर साथ होते थे। यह उम्र क्वांरे दौर का भटकाव और सिनेमा का जादू ही था कि कभी बीएचयू के संगीत महाविद्यालय कें वोकल सर्टिफिकेट कोर्स में दाखिला लिया जा रहा है तो कभी एनएसडी का फार्म लेने के लिए दिल्ली तक की पहली ट्रेनयात्रा हो रही है। अंततः यह पता लगने पर की नाटक के लिए लखनऊ स्थित भारतेन्दु नाटय अकादमी भी एक विकल्प हो सकता है, यहीं दाखिला लिया। तब रवीन्द्रालय में चलने वाला यह पार्ट टाइम कोर्स था। यहीं पहली बार प्रख्यात रंगगुरु राज बिसारिया जैसे शख्स से पाला पड़ा, जिनका एक रूप कड़क और अनुशासनप्रिय प्रशासक का रहा तो दूसरा रूप सच्चे शिक्षक का। यहीं पहली बार फिल्म के रचनात्मक और तकनीकी पक्ष को निकट से देखने और मूवी कैमरे में झांकने का मौका भी मिला। अकादमी ने शकऔर बाद में बनी गहराईजैसी फिल्म की निर्देशक जोड़ी अरुणाविकास देसाई को शिक्षण प्रशिक्षण के मकसद से आमंत्रित किया था। उल्लेखनीय है कि पुराने लखनऊ और आसपास के क्षेत्रों में फिल्मायी गई सत्यजित राय की फिल्म शतरंज के खिलाड़ीरिलीज हो चुकी थी और श्याम बेनेगल जुनूनबना रहे थे। लखनऊ के सदर इलाके के पुराने चर्च में शूटिंग चल रही थी, जिसे देखने को बंदा भी चर्च की दीवार पर चढ़ा था। इसी आकर्षण में नाटकों और फिल्मों पर लिखना-पढ़ना भी शुरू हुआ। नया सिनेमा के दौर की फिल्मों के साथ ही मुख्यधारा की फिल्मों पर भी ढेरों समीक्षाएं लिखीं।

इस दौर में बनारस में अजीज रविशेखर और संजय गुप्ता के साथ भी कई उल्लेखनीय फिल्में मैंने देखी। उन दिनों इन लोगों की रुचि मेंरे समीक्षक में कहीं ज्यादा थी। सागर और गुलामी सरीखी फिल्मों की समीक्षाएं मैंने इनके आग्रह पर ही लिखी। उस दौर में उत्तर प्रदेश और बिहार के सर्वाधिक संस्करण प्रकाशित करने वाले अखबार आजमें ये प्रकाशित होती थीं। इसी भूमिका के तहत पहली बार भारत के दसवें फिल्म समारोह को भी कवर किया। सही मायने में विश्व सिनेमा और अन्य भारतीय भाषाओं की फिल्मों के साथ यह पहला साबका था। विभिन्न खंडों में विभक्त समारोह के तहत लातीनी अमेरिकी फिल्मों को देखने और पुनरावलोकन खंड में ख्वाजा अहमद अब्बास की फिल्मों ने बहुत प्रभावित किया था। लघु फिल्मों और वृत्तचित्रों का भी व्यापक एक्सपोजर हुआ। सत्यजित राय की आखिरी फिल्म घरे बाइरे इसी समारोह में देखी, जो महोत्सव की समापन फिल्म थी। कहने का मतलब कि फिल्में देखने और उनपर लिखने पढ़ने का सिलसिला बढ़ता ही गया और एक पेशे की शक्ल अख्तियार कर लिया।

फिलमों के चक्कर में ही कुछ वर्ष तक मायानगरी मुंबई में प्रवास भी किया। जब सन अस्सी के अक्टूबर में किसी दिन महानगरी एक्सप्रेस से मुंबई पहुंचा था तो निश्चय ही फिल्मों को लेकर कुछ अस्पष्ट किस्म के सपने भी थे लेकिन उनमें शायद वो शिद्दत नहीं थी। मुंबई जैसे जनसमुद्र में खो जाने के अहसास के बीच नये बने कुछ संपर्क थे तो कुछ के महज रेफरेंसेज थे। मायानगरी में विचरण करने के दिनों की अलग कहानी है। शुरुआती दिन तो एक से दूसरे स्टुडियो और पाली हिल और खार की गलियों में भटकते बीते। फिर जल्दी ही समझ में आ गया कि इस विलासिता के लिए कुछ और भी करना होगा। बहरहाल मुंबई को लेकर जो सपने थे उन्हें समय की दरकार थी। और मेरे पास मुंबई के लिए शायद नियति के पास वह समय नहीं था।

यदि ऐसा न होता तो शायद पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते अचानक यह मक्का-मदीना छोड़ना नहीं होता। हालांकि आज इसका कोई पछतावा नहीं है फिर भी मुजफर अली की फिल्म उमराव जानकी नज़्म के बहाने कहना चाहूंगा कि इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हमने। फिल्मों ने यदि मुझे बिगाड़ा तो बनाया भी फिल्मों ने ही।

दस पसंदीदा फिल्में :

1. तीसरी कसम

2. गाइड

3. स्पर्श

4. मंडी

5. मिर्च मसाला

6. उत्सव

7. पार्टी

8. घरे बाइरे

9. अंधी गली

10. पार

Saturday, November 21, 2009

फ़िल्म समीक्षा : कु़र्बान


धुंधले विचार और जोशीले प्रेम की कहानी


-अजय ब्रह्मात्‍मज


रेंसिल डिसिल्वा की कुर्बान मुंबइया फिल्मों के बने-बनाए ढांचे में रहते हुए आतंकवाद के मुद्दे को छूती हुई निकलती है। गहराई में नहीं उतरती। यही वजह है कि रेंसिल आतंकवाद के निर्णायक दृश्यों और प्रसंगों में ठहरते नहीं हैं। बार-बार कुर्बान की प्रेमकहानी का ख्याल करते हुए हमारी फिल्मों के स्वीकृत फार्मूले की चपेट में आ जाते हैं।

आरंभ के दस-पंद्रह मिनटों के बाद ही कहानी स्पष्ट हो जाती है। रेंसिल किरदारों को स्थापित करने में ज्यादा वक्त नहीं लेते। अवंतिका और एहसान के मिलते ही जामा मस्जिद के ऊपर उड़ते कबूतर और शुक्रन अल्लाह के स्वर से जाहिर हो जाता है कि हम मुस्लिम परिवेश में प्रवेश कर रहे हैं। हिंदी फिल्मों ने मुस्लिम परिवेश को प्रतीकों, स्टारों और चिह्नों में विभाजित कर रखा है। इन दिनों मुसलमान किरदार दिखते ही लगने लगता है कि उनके बहाने आतंकवाद पर बात होगी। क्या मुस्लिम किरदारों को नौकरी की चिंता नहीं रहती? क्या वे रोमांटिक नहीं होते? क्या वे पड़ोसियों से परेशान नहीं रहते? क्या वे आम सामाजिक प्राणी नहीं होते? कथित रूप से सेक्युलर हिंदी फिल्म उद्योग की इस सांप्रदायिकता पर ध्यान देने की जरूरत है। इस मायने में रेंसिल डिसिल्वा की कुर्बान अलग प्रतीत होती है, लेकिन अंदर से वैसी ही पारंपरिक और रूढि़वादी है।

अवंतिका न्यूयार्क से भारत आई है। वह एक कालेज में पढ़ा रही है। उसी कालेज में एहसान खान की अस्थायी नियुक्ति होती है। चंद मुलाकातों में दोनों शादी कर लेते हैं और फिर न्यूयार्क पहुंचते हैं। इसके बाद घटनाएं मोड़ लेती हैं। आतंकी साजिश में फंस चुकी अवंतिका अंत तक हिम्मत नहीं हारती। वह कोशिश करती है कि इन साजिशों के बारे में बता सके। रियाज मसूद उदारवादी मुस्लिम के तौर पर सामने आता है, लेकिन वह है बिल्कुल फिल्मी किरदार। वह सुरक्षा एजेंसियों की मदद लेने के बजाए खुद ही मामले को सुलझाना चाहता है, क्योंकि उसकी प्रेमिका आतंकवाद का निशाना बन चुकी है। आतंकवाद से लड़ने की इस बचकानी कोशिश पर हंसी आती है और पता चलता है कि कैसे हिंदी फिल्मों के लेखक-निर्देशक अपनी सीमाओं की जकड़ से निकलना नहीं चाहते। वैचारिक और सैद्धांतिक स्तर पर अवश्य ही कुर्बान में आतंकवाद के फैलाव के लिए अमेरिकी सामरिक और राजनयिक नीतियों को दोषपूर्ण माना गया है, लेकिन उन तर्को को सुनते हुए आतंकवादी गतिविधियां जायज लगने लगती हैं। एहसान और उसके साथियों की साजिशें उचित लगने लगती हैं। लेखक-निर्देशक सैद्धांतिक रूप से स्पष्ट नहीं है। यह ढुलमुलपन कुर्बान को आतंकवाद की पृष्ठभूमि पर बनी एक कमजोर फिल्म साबित करता है। हां, प्रेम कहानी के चित्रण में अवंतिका और एहसान के द्वंद्व, अविश्वास और प्रेम के चित्रण में निर्देशक का जोश दिखाई पड़ता है। सैफ और करीना के अंतरंग दृश्य शिष्ट और बेहतर हैं।

*** तीन स्टार


Friday, November 20, 2009

दरअसल : महत्वपूर्ण फिल्म है रोड टू संगम


-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले दिनों मुंबई में आयोजित मामी फिल्म फेस्टिवल में अमित राय की फिल्म रोड टू संगम को दर्शकों की पसंद का अवार्ड मिला। इन दिनों ज्यादातर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में दर्शकों की रुचि और पसंद को तरजीह देने के लिए आडियंस च्वॉयस अवार्ड दिया जाता है। ऐसी फिल्में दर्शकों को सरप्राइज करती हैं। सब कुछ अयाचित रहता है। पहले से न तो उस फिल्म की हवा रहती है और न ही कैटेगरी विशेष में उसकी एंट्री रहती है।

रोड टू संगम सीमित बजट में बनी जरूरी फिल्म है। इसके साथ दो अमित जुड़े हैं। फिल्म के निर्माता अमित छेड़ा हैं और फिल्म के निर्देशक अमित राय हैं। यह फिल्म अमित राय ने ही लिखी है। उन्होंने एक खबर को आधार बनाया और संवेदनशील कथा गढ़ी। गांधी जी के अंतिम संस्कार के बाद उनकी अस्थियां अनेक कलशों में डालकर पूरे देश में भेजी गई थीं। एक अंतराल के बाद पता चला था कि गांधी जी की अस्थियां उड़ीसा के एक बैंक के लॉकर में रखी हुई हैं। कभी किसी ने उस पर दावा नहीं किया। अमित राय की फिल्म में उसी कलश की अस्थियों को इलाहाबाद के संगम में प्रवाहित करने की घटना है।

गांधी जी की मृत्यु के बाद उनकी अस्थियां इलाहाबाद के संगम में प्रवाहित की गई थीं। अस्थि कलश को जिस गाड़ी से ले जाया गया था, वह इलाहाबाद के एक संग्रहालय में है। वर्षो बाद फिर से अस्थियां प्रवाहित करने की योजना बनती है, तो उसी गाड़ी के इस्तेमाल की बात सोची जाती है। समस्या यह है कि सालों से बंद होने के कारण वह गाड़ी खराब हो गई है। इलाहाबाद के मेकेनिक हशमत उल्लाह को गाड़ी ठीक करने का काम सौंपा जाता है। उनके अलावा और कोई उसे ठीक नहीं कर सकता। हशमत बड़े मनोयोग से यह काम शुरू करते हैं। बाद में उन्हें पता चलता है कि इस गाड़ी से गांधी जी की अस्थियां ले जाई जाएंगी, तो उनका मनोबल बढ़ जाता है। इस बीच शहर में दंगा होता है। कुछ मुसलिम नेताओं को गिरफ्तार कर लिया जाता है। उनकी गिरफ्तारी के खिलाफ मुसलिम नेता लामबंद होते हैं और वे फतवा जारी करते हैं कि उनके नेताओं की रिहाई तक इलाके की सभी दुकानें बंद रहेंगी। मजबूरन हशमत को अपना गैरेज बंद रखना पड़ता है। मामला लंबा ख्िाचता है, तो हशमत चिंतित होते हैं। उन्हें लगता है कि अगर समय पर गाड़ी ठीक नहीं हुई, तो उस महान आत्मा के साथ नाइंसाफी होगी। वे फतवे के विरुद्ध हो जाते हैं, गैरेज खोलते हैं और शांतिपूर्ण तरीके से अपना काम करते हैं। उनकी ईमानदारी और सादगी का प्रभाव इतना प्रबल है कि धीरे-धीरे दूसरे लोगों का नैतिक सहयोग उन्हें मिलने लगता है। आखिरकार गाड़ी ठीक हो जाती है और उसी गाड़ी से अस्थियां प्रवाह के लिए ले जाई जाती हैं।

हिंदी फिल्मों में मुसलिम किरदारों को पेश करने के निश्चित प्रारूप हैं। वे या तो त्याग करते हैं या फिर आतंकवादी होते हैं। हमारे फिल्मकारों ने मुसलिम समाज की दुविधा और व्यथाओं को व्यक्त ही नहीं किया है। उनके जीवन के हर्ष-विषाद भी हम नहीं जानते। रोड टू संगम में एक छोटे शहर का समाज है। फिल्म के किरदार वास्तविक और पड़ोसी लगते हैं।

च् अमित राय ने देश के मुसलमान और उनकी भावनाओं को नए तरीके से दर्शकों के सामने रखा है। देश के ज्यादातर मुसलमान हशमत की तरह सोचते हैं, लेकिन वे कट्टरपंथी नेताओं के आगे खड़े नहीं हो पाते। उन्हें अपनी बिरादरी से निष्कासन और हुक्का-पानी बंद होने का डर रहता है। हशमत के तर्क और सवाल देश के मुसलमान मन को अच्छी तरह व्यक्त करते हैं। फिल्म सादगी के साथ अपना मंतव्य रखती है। फिल्म में कोई स्टार नहीं है। फिल्म के मुख्य कलाकार परेश रावल, ओम पुरी, पवन मल्होत्रा और जावेद शेख हैं।


Sunday, November 15, 2009

फिल्‍म समीक्षा : तुम मिले

पुनर्मिलन का पुराना फार्मूला

-अजय ब्रह्मात्‍मज

पहले प्राकृतिक हादसों की पृष्ठभूमि पर काफी फिल्में बनती थीं। बाढ़, सूखा, भूकंप और दुर्घटनाओं में परिवार उजड़ जाते थे, किरदार बिछुड़ जाते थे और फिर उनके पुनर्मिलन में पूरी फिल्म निकल जाती थी। परिवारों के बिछुड़ने और मिलने का कामयाब फार्मूला दशकों तक चला। कुणाल देशमुख ने पुनर्मिलन के उसी फार्मूले को 26-7 की बाढ़ की पृष्ठभूमि में रखा है।

मुंबई आ रही फ्लाइट के बिजनेस क्लास में अपनी सीट पर बैठते ही अक्षय को छह साल पहले बिछड़ चुकी प्रेमिका की गंध चौंकाती है। वह इधर-उधर झांकता है तो पास की सीट पर बैठी संजना दिखाई पड़ती है। दोनों मुंबई में उतरते हैं और फिर 26 जुलाई 2005 की बारिश में अपने ठिकानों के लिए निकलते हैं। बारिश तेज होती है। अक्षय पूर्व प्रेमिका संजना के लिए फिक्रमंद होता है और उसे खोजने निकलता है। छह साल पहले की मोहब्बत के हसीन, गमगीन और नमकीन पल उसे याद आते हैं। कैसे दोनों साथ रहे। कुछ रोमांटिक पलों को जिया। पैसे और करिअर के मुद्दों पर लड़े और फिर अलग हो गए। खयालों में यादों का समंदर उफान मारता है और हकीकत में शहर लबालब हो रहा है। खौफनाक भीगे माहौल में दोनों प्रेमियों का मन भी भीगता है और गलतफहमियों की मैल धुल जाती है। दोनों की समझ में आता है कि वे एक-दूसरे के लिए ही बने हैं।

महेश भट्ट की प्रस्तुति में हर निर्देशक की फिल्म रोमांस को जरूर टच करती है। उनकी फिल्मों में रोमांस को बढ़ाने और व्यक्त करने में मधुर गीतों का सुंदर इस्तेमाल होता है। भट्ट कैंप की फिल्मों में संगीत के साथ गीत के शब्दों पर अपेक्षित ध्यान दिया जाता है। शायरी नजर आती है और नए शब्दों में पुराने भाव कहे जाते हैं। तुम मिले का गीत-संगीत मधुर हैं और देर तक कानों में गूंजता रहता है।

कुणाल देशमुख बिछुड़े प्रेमियों के पुनर्मिलन की कहानी दिखाने में सफल रहे हैं, लेकिन 26 जुलाई की बाढ़ को रिक्रिएट करने में उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली है। सीमित बजट का दबाव साफ नजर आता है। मुंबईवासी 26 जुलाई की भयावहता और दहशत से आज भी नहीं निकल पाए हैं। दो दिन तेज बारिश हो जाए तो अफवाहें तैरने लगती हैं। वह भयावहता फिल्म में उभर नहीं पायी है। शहर में पानी भरने के दृश्य और सड़कों पर फंसे लोगों की अफरा-तफरी के चित्रण में कुणाल देशमुख विफल रहे हैं।

इमरान हाशमी और सोहा अली खान ने अपने चरित्रों का सुंदर और प्रभावशाली निर्वाह किया है। दोनों के अभिनय में निखार दिखता है। इस फिल्म में किरदारों की स्टाइलिंग और लुक पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है। सोहा अली खान के परिधानों से उनके किरदार की अमीरी नहीं झलकती। वैसे भी सोहा अली खान स्टाइल और अपीयरेंस के प्रति सचेत नहीं दिखतीं।

Friday, November 13, 2009

भारत का पर्याय बन चुकी हैं ऐश्वर्या राय

-हरि सिंह
ऐश्वर्या राय के बारे में कुछ भी नया लिख पाना मुश्किल है। जितने लिंक्स,उतनी जानकारियां। लिहाजा हमने कुछ नया और खास करने के लिए उनके बिजनेस मैनेजर हरि सिंह से बात की। वे उनके साथ मिस व‌र्ल्ड चुने जाने के पहले से हैं। हरि सिंह बता रहे हैं ऐश के बारे में॥
मुझे ठीक-ठीक याद नहीं कि मैंने कब उनके साथ काम करना आरंभ किया। फिर भी उनके मिस व‌र्ल्ड चुने जाने के पहले की बात है। उन्होंने मॉडलिंग शुरू कर दी थी। मिस इंडिया का फॉर्म भर चुकी थीं। आरंभिक मुलाकातों में ही मुझे लगा था कि ऐश्वर्या राय में कुछ खास है। मुझे उनकी दैवीय प्रतिभा का तभी एहसास हो गया था। आज पूरी दुनिया जिसे देख और सराह रही है, उसके लक्षण मुझे तभी दिखे थे। मॉडलिंग और फिल्मी दुनिया में शामिल होने के लिए बेताब हर लड़की में सघन आत्मविश्वास होता है, लेकिन हमलोग समझ जाते हैं कि उस आत्मविश्वास में कितना बल है। सबसे जरूरी है परिवार का सहयोग और संबल। अगर आरंभ से अभिभावक का उचित मार्गदर्शन मिले और उनका अपनी बेटी पर भरोसा हो, तो कामयाबी की डगर आसान हो जाती है।
ऐश के साथ यही हुआ। उन्हें अपने परिवार का पूरा समर्थन मिला। मां-बाप ने उन्हें अपेक्षित संस्कार और मूल्यों के साथ पाला। अपने लंबे परिचय के आधार पर मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में इतनी संस्कार वाली दूसरी कोई अभिनेत्री नहीं है। ऐश बड़ों का मान-सम्मान करना जानती हैं। फिल्म इंडस्ट्री के किसी भी सीनियर व्यक्ति से आप बात कर लें। उन्होंने उनके साथ काम किया हो या नहीं किया हो, लेकिन अगर एक बार मिल चुके हैं, तो वे ऐश के गुण गाते मिलेंगे। वे गुणवंती हैं। आदर्श बेटी, बहन, बीवी और बहू हैं। अपने सभी रिश्तों को उन्होंने सहेज कर रखा है। उन रिश्तों को वे आदर, स्नेह और प्यार से सींचती रहती हैं। वे खुद काफी व्यस्त रहती हैं, लेकिन एक पल को भी संबंधों के बीच में व्यस्तता को आड़े नहीं आने देतीं। निश्चित ही उनके करीबी भी उनकी भावनाओं को समझते हैं और उन्हें भी पूरी जगह देते हैं। हर संबंध परस्पर व्यवहार और सम्मान से ही खिलता है।
मैं अपने अनुभवों से ही उदाहरण दूं, तो ऐश्वर्या के लिए कतई जरूरी नहीं है कि वे कभी मेरे पांव छूएं। अपने हर जन्मदिन पर वे ऐसा कर आशीर्वाद लेती हैं। इस एक सामान्य सम्मान से वे कितनी दुआएं ले लेती हैं। दिल से उनके लिए दुआ निकलती है। मुझे याद है कि शादी की रस्म निभाने के बाद जब बड़ों से आशीर्वाद लेने की बारी आई, तो उन्होंने तमाम प्रतिष्ठित लोगों के बीच भी ऐसा ही किया। अभिषेक बच्चन ने भी उनका अनुकरण किया। आज सोचता हूं, तो लगता है कि उनकी यह सहज क्रिया के पीछे कितना सम्मान और संस्कार रहा होगा। अमूमन बड़े और मशहूर होने के बाद लोग अदब भूल जाते हैं। अपने पारिवारिक और पारंपरिक मूल्यों को निभाने में भी झेंप महसूस करते हैं।
दैवीय सौंदर्य की धनी ऐश्वर्या राय की कद्र पूरी दुनिया करती है। मुझे विदेशों के लोग मिलते हैं, तो वे बताते हैं कि कैसे पूरी दुनिया के लोग उन्हें पहचानते हैं। भारत का नाम लेते ही उनके जहन में ऐश का नाम आता है। वह भारत का पर्याय बन चुकी हैं। यह बड़ी उपलब्धि है और उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी भी है। ऐश्वर्या में नैसर्गिक प्रतिभा है। उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से उसे निखारा है। शुरू से ही वे मेहनत करने से नहीं हिचकतीं। आज नाम और पहचान होने के बाद भी वे मेहनत में ढील नहीं करतीं। आमतौर पर अपने यहां शादी के बाद हीरोइनों को नई फिल्मों के ऑफर नहीं मिलते, लेकिन उनके पास अभी चार फिल्में हैं। वे दक्षिण भारत के शंकर और मणिरत्नम के साथ काम कर रही हैं, तो हिंदी की विपुल शाह और संजय लीला भंसाली की फिल्में भी कर रही हैं। उनके साथ हर डायरेक्टर काम करना चाहता है। अगर पिछले दशक की दस बड़ी फिल्मों की सूची बनाएं, तो उसमें आधी में ऐश मिलेंगी। इस उपलब्धि का उन्हें रत्ती भर अभिमान नहीं है। जीवन में नाम और पैसा तो बहुत से लोग कमाते हैं, लेकिन लोगों का प्यार कमाना आसान नहीं होता। उससे भी मुश्किल है अपने से बड़ों का आशीर्वाद पाना। मैं तो उन्हें लगातार देख रहा हूं। उनके व्यक्तित्व में जरा भी बदलाव नहीं आया है। मैं तो कहूंगा कि वे और भी विनम्र और समझदार हो गई हैं। आने वाले समय में शायद ही कोई लड़की उनसे आगे निकल पाए। वे मिसाल हैं कि ग्लैमर की दुनिया में भी अपने संस्कारों के साथ कैसे सिर ऊंचा रखा जा सकता है। वे संस्कारी हैं और अच्छी बात यह हुई कि वे संस्कारवान परिवार में गई। उनका बच्चन परिवार की बहू बनना सोने पर सुहागा की तरह है।

Thursday, November 12, 2009

दरअसल: फिल्म की रिलीज और रोमांस की खबरें


-अजय ब्रह्मात्मज

इन दिनों हर फिल्म की रिलीज के पंद्रह-बीस दिन पहले फिल्म के मुख्य कलाकारों के रोमांस की खबरें अखबारों में छपने और चैनलों में दिखने लगती हैं। पिछले दिनों रणबीर कपूर और कट्रीना कैफ की अजब प्रेम की गजब कहानी आई। रिलीज के पहले खबरें दिखने लगीं कि रणबीर-कैट्रीना की केमिस्ट्री गजब की है। वास्तव में दोनों के बीच रोमांस चल रहा है, इसलिए उनके प्रेमी खिन्न हैं। दोनों के संबंध अपने-अपने पे्रमियों से खत्म हो चुके हैं। अखबार और चैनलों पर यही खबर थी।
अगर फिल्मों और उसके प्रचार के इतिहास से लोग वाकिफ हों या थोड़े भी सचेत ढंग से इन खबरों पर नजर रखते हों, तो उन्हें याद होगा कि यह सिलसिला पहले सुपर स्टार राजेश खन्ना के समय से चला आ रहा है। एक प्रचारक ने नियोजित तरीके से हर फिल्म की हीरोइन के साथ राजेश खन्ना के प्यार की किस्से बनाए। कभी फिल्म की युगल तस्वीरें तो कभी किसी पार्टी की अंतरंग तस्वीरों से उसने इन खबरों को पुख्ता किया। राजेश खन्ना की रोमांटिक फिल्मों को ऐसे प्रचार से फायदा हुआ। बाद में इस तरकीब को दूसरों ने अपनाया और कमोबेश उनकी फिल्मों को भी लाभ हुआ।
मीडिया विस्फोट और समाचार चैनलों की होड़ में रोमांस की ऐसी अधपकी खबरों और कयासों को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है। कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता। ऐसी खबरों की तिल भर सच्चाई में अपनी तरफ से कुछ-कुछ जोड़कर मीडिया ही ताड़ बनाता है। कह सकते हैं कि हम सभी प्रचारकों की रणनीति का हथियार बनते हैं, इस्तेमाल होते हैं और फिर खुद के खड़े किए ताड़ के गिर जाने पर मन मसोस कर कहते हैं -हमें तो लग रहा था कि खबर झूठी है, लेकिन सभी दिखा और बता रहे थे, तो हम क्या करते? हम नहीं करते तो हमारी नौकरी चली जाती। मीडिया में ऐसी असुरक्षा फैल गई है कि सभी झूठी खबर फैलाने में आगे निकलना चाहते हैं।
रणबीर कपूर और कट्रीना कैफ का ही मामला लें। रणबीर और दीपिका पादुकोण घोषित प्रेमी युगल हैं। दोनों विभिन्न अवसरों पर साथ दिखते हैं और एक-दूसरे की दोस्ती की दुहाई भी देते हैं। अचानक खबर आई कि दोनों के बीच सब कुछ खत्म हो गया है। ऐसा हो भी सकता है। जब वर्षो के शादीशुदा युगल अलग हो सकते हैं, तो प्रेमियों के अलग होने में कैसा आश्चर्य? लेकिन जब उसी के साथ यह खबर भी आती है कि रणबीर का चक्कर इन दिनों कट्रीना के साथ चल रहा है, जो उनकी ताजा फिल्म अजब प्रेम की गजब कहानी की हीरोइन हैं। फिर शक होता है। कहा जाता है कि प्रकाश झा की फिल्म राजनीति में भी दोनों साथ आ रहे हैं। इस तरह दो फिल्मों का साथ रोमांस की खबर के लिए काफी है। इसके साथ यह बात भी फैलाई जाती है कि सलमान खान और कट्रीना के बीच अब पुरानी गर्मजोशी नहीं रही। वे अब उस रिश्ते को नहीं ढोना चाहतीं। फिर से कहूं, तो कट्रीना के लिए यह मुमकिन है, लेकिन ठीक रिलीज के पहले इस खबर पर भरोसा नहीं होता।
फिल्म के प्रचार के लिए स्टारों की यह मिलीभगत हो सकती है। फिल्म के हीरो-हीरोइन ऑन स्क्रीन रोमांस कर सकते हैं, तो ऑफ स्क्रीन अंतरंगता का नाटक करने में उन्हें कितनी मशक्कत करनी होगी। अगर उनकी ऐसी हरकत से फिल्म को फायदा होता है, तो वे सहज ही रोमांस के अभिनय के लिए तैयार हो जाते हैं। पूछने पर कहेंगे भी कि आप अफवाहों पर यकीन न करें या यह हमारा निजी मामला है या इस पर मुझे कुछ नहीं कहना है। उनकी कोई भी प्रतिक्रिया ऐसी खबर को भड़काने के काम आती है। पिछले दिनों कट्रीना ने स्पष्ट कहा, मुझे फिल्म के प्रचार का यह तरीका पसंद नहीं है। फिर भी मीडिया उनसे रणबीर से रोमांस के बारे में पूछता रहा। वे कभी दुखी, कभी परेशान और कभी हंसते हुए जवाब देती रहीं।

Tuesday, November 10, 2009

हिंदी टाकीज द्वितीय : आय लव यू, आय लव यू नॉट, आय लव यू, आय लव यू नॉट......-स्‍वप्निल कान्‍त दीक्षित

हिंदी टाकीज द्वितीय-1

हिंदी टाकीज की 50 कडि़यों का सफर पूरा हो चुका है। द्विजीय सीरिज की शुरूआत हो रही है। उम्‍मीद है कि आप का सहयोग और योगदान मिलता रहेगा। द्वितीय सीरिज की पहली कड़ी स्‍वप्‍न‍िल ने लिखी । आप इनकी टाटा जागृति यात्रा अभियान में शामिल हो सकते हैं।


स्वप्निल कान्त दीक्षित टाटा जागृति यात्रा के एक्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर हैं। आई. आई. टी. खडगपुर से स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण (जी हाँ, उत्तीर्ण) करने के बाद दो साल कोर्पोरेट सेक्टर में कार्यरत रहने के बाद देश के युवाओं को उद्यमशीलता के लिये प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से पिछले दो साल से टाटा जागृति यात्रा आयोजित करते आ रहे हैं। उनका बचपन लखनऊ, हरदोई, बरेली, जैसे शहरों और खुदागंज (उप्र) बहादुरपुर (उप्र), घोडाखाल (उत्तराखण्ड) इत्यादि गाँवों में बीता है। ये थियेटर, स्थापथ्य कला, सांख्यिकि, संगीत और लेखन-पठन में रुचि रखते हैं।


बँगला नं ४, बरेली कैण्ट, १९८५ से ले कर १९८९ के बीच के किसी साल की सर्दी की शाम ५ बजे बँगले के एक अहाते में निवाड से बुनी खटिया पर, और आसपास जुटाये गये मूढों पर करीब दस लोग बैठे हैं - नानी, नानी के भाई विनोद नाना जिन्होनें बासठ की लडाई में गोली खाई थी, और चीनियों की गिरफ़्त से भाग निकले थे, विनोद नाना के बच्चे - अजय माम, मीनू मौसी, गुड्डो मौसी, और शारीरिक काबलियत से सीमित मगर मस्तिष्क से पुष्ठ टिन्कू मौसी, महरी नानी - जिन्हें महानगरों में 'मेड' कहते हैं, लगभग सात से नौ वर्ष की अवस्था का मैं और शायद आसपास रहने वाले एक दो दोस्त। शुरु करो अंताक्षरी ले कर हरि का नाम, समय बिताने के लिये करना है कुछ काम! मेर जूता है जापानी, पतलून, टोपी, दिल है हिन्दुस्तानी! नाना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे.... इन्कार, इकरार .. बैठे.. ठ... ठ.. ठ... ठ १... ठ २... ठ ३.... ठ ५.... ठण्डे ठण्डे पानी से नहाना चाहिये, गाना आये या ना .. गाना चाहिये! यम्मा यम्मा.... बस आज की रात है ज़िन्दगी..... ये नहीं चलेगा.. ए है .. नही.. चाहिये में य पे ए की मात्रा होती है .. नहीं, तुम मेरी किताब में देख लो... ए है खाली... सबसे बडी गुड्डो मौसी...चुप रहो! टिन्कू बतायेगी.... टिन्कू... ये कि ए.. फ़र्स्ट या सेकन्ड... हो गया फ़ैसला...ए! ए मालिक तेरे बन्दे हम, ऐसे हो हमारे करम! मेरे सामने.. वाली खिड्की में .. रहता है! हम लाये हैं तूफ़ान से, ... निकाल के.. सँभाल के... क... क... क... क१... क२... क३.. गुड्डो मौसी! दोहा अलाउड है न! चल ठीक है, इस बार अलाउड! काल करे सो आज कर, आज करे सो अब्ब; पर में परलय होएगी, बहुरि करैगो कब्ब ब...ब....ब... ब१, ब२, ब३.... समस्या गहन है। विमर्श हो रहा है। घडी की सूई टिक-टिक बढ रही है। पेशानियों पर बल गहराते जा रहे हैं। एक जोडी होंठ केवल मुस्करा रहे हैं। गिनती गिनने वाले का भी कलेज़ा काँप रहा है - अगर उसने ना बोला, तो मैं क्या बोलूँगा! ब६, ब७, ब८, ब९.... बूढा स्वर,,, रुको! .. सब के सब नालायक! इतना भी नही जानते... बताओ ना नानी! बताओ ना! बहू बेगम! सब आश्चर्यचकित! ये क्या है! नानी का डेक्लरेशन --- अब से फ़िल्म का नाम भी अलाउड! तालियाँ.. और जाने कितने घण्टे बरबाद! ऐसा ही कुछ रहा होगा मेरा हिन्दी फ़िल्मों से परिचय! नोट करने वालों ने ध्यान दिया होगा कि फ़िल्मों का इस्तेमाल तो था, लेकिन खुलेआम नही। फ़िल्में प्रशंसित थीं पर परमिटिड नहीं (दौर भी तो लैसंस-राज का था)।

सबसे पहला सिनेमाहाली लम्हा जो याद है, वो है - दीवाली के आसपास समोसे खाने के चक्कर में मम्मीपापा के साथ जाने के लिये, परम-प्रिय नानी को छोडने को तैयार होना - समोसा मिला और साथ में एक गाना भी याद हो गया - पडोसी देखें बाजा कैसे बजे, कैसे बजे, कै-ए से-ए बजे, पडोसी देखे बाजा कैसे बजे! अब पता है कि उस सीन में प्रेमी और प्रेमिका अपनी मज़बूरी बयान कर रहे थे कि पडोसियों के देखते हुए वो 'बाजा कैसे बजाऎं' मुझे याद है कि मुझे समझ नहीं आता था कि पडोसी के देखते बाजा बजाने में क्या दिक्कत है?

उसके बाद याद है कि अजय मामा के साथ उनकी कपडो की दुकान को नौकर के भरोसे छोड कर सायकिल के डण्डॆ पर बैठ कर द्रुत गति से प्रभा सिनेमा की ओर लगभग पलायन - अजय मामा की जबरदस्त हँफाई की आवाज़ और अँधेरे कमरे में मिथुन दा की 'जाल' देखने के लिये प्रवेश। इस फ़िल्म में मिथुन दा कालेज के बास्क्टबाल कोर्ट पर करतब दिखाते हैं। एक मैच था जिसे जीतना हिरोइन के लिये अति-आवश्यक था। तब मिथुन दा ने शुद्ध साइंस का सहारा लेते हुए 'स्प्रिंग वाले जूते' नाम का एक यंत्र अपने बैग से निकाला। इस यंत्र का कमाल ये था कि इस से कोई भी पप्पू ८ से १० फ़ीट की छलाँग आसानी से लगा सकता था। अब बस हो गया काम! लेकिन इस सीन के बाद (और शायद पहले भी) मुझे पिच्चर खास समझ नहीं आई। लेकिन मुझे इस पिच्चर से ज़बरदस्त फ़ूड फ़ॉर थॉट मिला था। बहुत बाद जब आई आई टी की तैयारी का समय आया, तो मैने बाकायदा कोशिश की कि यदि एक स्प्रिन्ग वाला जूता बनाया जाये तो उसके लिये लगने वाले स्प्रिन्ग का स्प्रिन्ग कन्स्टेन्ट कितना होना चाहिये। आगे यदि मैं मटीरियल साइंस की पढाई करता तो ज़रूर ऐसा जूता तैयार करने की कोशिश करता। हिन्दी टाकीज़ लिखने वालों में से शायद मै सबसे बोरिंग और 'नर्डी' हूँ। मुझे फिल्मो का भूत चढता ही नहीं था।

कुछ जानने वाले मुझे पार्शियल लोनर भी कहते हैं। शायद इसकी नींव भी फ़िल्मों के कारण ही पडी। ऐसा नहीं कि देवदास देख कर दुखी मन से नकटिया नाले के किनारे घूमते घूमते मैं लोनर में विकसित हो गया। मेरे साथ कुछ ऐसा था कि दूरदर्शन पर आने वाली संडे शाम की पिच्चर मेरे ७ या ८ साल के दिमाग को इतनी बोरिंग लगती थी (चवन्नी पर ही महेश भट्ट का लेख बाल-फ़िल्मों पर उल्लेखनीय) कि मैंने एक दिन ऐसी ही एक पिक्चर देखते हुए ये फ़ैसला लिया कि अब मैं इन्हें देखूँगा ही नहीं - ये क्षण था जब परदे पे गाना चल रहा था - तेरे मेरे बीच में कैसा है ये बंधन अंजाना ~~~~~ आ आ ~~~~ आ आ ~~~~~~ आ आअ ````` इस आ आ की सीरीज़ ने इतना परेशान किया कि मुझ से रहा नहीं गया और मेरी संडे की शाम बदल गयी। इन पिक्चरो से भाग निकलने के लिये जब मैंने दोस्त ढूँढना शुरु किये तो पता चला कि साले सब के सब टीवी से चिपक गये है - लिहाज़ा मेरा लोनर पैदा होना शुरु हो गया। हाँ, कभी कभार एक आतंकवादी भी पैदा होता था जो सबसे कमीनी आंटी की घण्टी बजा कर भागने में माहिर था। कुछ ऐसा था कि फ़िल्मों का भूत चढता ही नहीं था - हाँ, रामलीला देखने के लिये मारा मारी करने को भी मैं तैयार रहता था।

फिर भी, एक शुद्ध हिन्दुस्तानी की तरह मैने भी स्कूल से भाग कर एक पिक्चर देखी। मैं और संजय तिवारी, जिसकी मैं बहुत इज़्ज़त करता था क्योंकि उसकी साइकिल बहुत मेन्टेण्ड रहती था, साथ साथ एक साजिश में शामिल हुए। हमने स्कूल से भागकर पिच्चर देखने का फ़ैसला किया। उस चक्कर में करीब तीन हफ़्ते लगे। सोचा गया कि बालकनी में देखी जाएगी, और मार्केट रिसर्च के तौर पर एक एक बार सारे हॉलों के दाम पता किये गये। तीन हफ़्ते तक पैसे बचाने पर हम लोग शहर के सबसे अच्छे सिनेमा प्रभा सिनेमा में पिच्चर देख सकते थे। तीन हफ़्ते पूरे होने पर पता लगा कि खाने पीने का पैसा जोडना तो भूल ही गये थे। उसे सम्मिलित करने पर हिन्द टाकीज़ का ही फ़्न्ड बच पाया था। प्रभा का सपना सपना ही रह गया। यहाँ क्योंकि पिच्चर देखना ही महत्वपूर्ण था, इस बात का कोई मतलब नहीं था कि पिच्चर है कौन सी। लिहाज़ा हिन्द टाकीज़ के बैक-स्टाल (हाय बाल्कनी) में बैठ कर करीब १० से १२ दर्शकों के साथ पिक्चर देखी गयी - हत्यारिन!

इस पिक्चर से मैं बहुत प्रभावित हुआ था। मुझे स्टोरी बहुत जानदार लगी थी और हिन्दे फ़िल्मों की ओर फ़िर से रुचि बढी। देखिये, तीन बिज़्नस पार्टनर थे, जिनमें से दो ने मिल कर तीसरे के साथ धोखा किया था और उसे ही नहीं, उसकी पत्नी को भी निपटा दिया। पत्नी भूत बन गयी और बदला लेने पर उतारू हो गयी। लास्ट में तांत्रिक वगैरह की मदद से भूत को शान्त किया गया, लेकिन क्योंकि हिरोइन भूत थी, उसका बदला पूरा होने पर ही वो शान्त हो सकी। सीधी से स्टोरी है लकिन क्या क्रिएटिव मोडस ओपरॉण्डी था उसका। मिसाल के तौर पर - बेईमान बिज़नस पार्टनर के बिगडे बेटे की शादी है। वो दारू के नशे में धुत्त सुहाग रात मनाने पहुँचता है और कुछ ऐसे डायलाग बोलता है जिससे कि दर्शकों के उससे रही बची सहानुभूति भी खत्म हो जाती है, जैसे - अरे मेरी अनारकली! कब से तेरे पकने का इंतज़ार कर रहा था, आज हाथ आई है तो शर्माती है। इसके जवाब में उसकी नवविवाहिता पत्नी कुछ नहीं बोलती है। तब ये बिगडा लडका कहता है कि ज़रा घूँघट तो उठा दो। ठीक इसी समय दर्शकों में रेप सीन की संभावना के चलते हलचल मचती है। पत्नी कहती कुछ नहीं, सिर्फ़ सिर होरिज़ेन्ट्ली हिला कर ना कहती है। तब बिगडा लडका रेपिस्ट वाली हँसी हँसता है और कहता है - तब क्या मैं ही उठा दूँ। इस बार पत्नी वर्टिकली सिर हिला का हामी भरती है। रेप-सीन की आशा में सधे दर्शक निराश होते हैं लेकिन 'सीन' की आशा अभी भी बरकरार रहती है। एक एक कदम घिसक कर लडका अपनी नवविवाहिता के पास पहुँचता है। उसका हाथ घूँघट की तरफ़ बढता है - और जैसे ही घूँघट हटता है, विशालकाय परदे पर सिर्फ़ भूतनी का चेहरा और स्पीकरों से बिगडे लडके की चीखें। हर बार हत्यारिन ऐसे ही कोई क्रिएटिव तरीका इख्त्यार करती थी। मैं हत्यारिन की भूतनी का फ़ैन हो कर लौटा था और मुझे तब से ले कर आज तक हीरो या हिरोएन द्वारा विलेन से लिये गये बदले मे रामलीला और हत्यारिन का मिक्स मज़ा आता है। इस फ़िल्म से मेरे जीवन में दो फ़र्क आये - एक तो मैं कभी बाल लेने के लिये पुराने मकान में नहीं गया, और दूसरा मुझे फ़ुल्लड भैया से अपना बार्न्विटा शेयर करते रहना पडा क्योंकि वो उस दिन 'हिन्द' में ही थे।

इसके बाद जीवन कतई बदल गया। मेर दाखिला सैनिक स्कूल में हो गया। वहाँ तमाम पाबंदियाँ थीं। बहुत सुबह उठना और बहुत जल्दी सोना पडता था। रैगिंग के मामले में आज के इन्जीनियरिंग कॉलेज उसका क्या मुकाबला करेंगे। पहले दिन दो सीनियर आये और पूछा - बता, हम में से बेहतर कौन है? अब तो पिटना ही था तो तगडे वाले को बेहतर बता कर कमज़ोर वाले के झापड खा लिये। इन सब पाबंदियों के बावजूद वहाँ कुछ ऐसा था जिससे मेरे जीवन में फ़िल्मों को ले कर बदलाव आने वाला था। वहाँ एक ५०० सीटों वाला आडिटोरियम था जिसका नाम था रतनदीप और हर हफ़्ते वहाँ कमपलसरी फ़िल्म शो भी होता था। बडे फ़ौज़ी स्टाइल में - सबकी सीटें फ़िक्स थीं। जूनियर आगे बैठते थे और सीनियर पीछे। एक होस्टल सुपरिण्टेन्डेन्ट थे जिनका नाम लड्को ने दुधारी रखा था। वोही फ़िल्म आपरेट करते थे। हर शनिवार को दो शो होते थे - ३:३० बजे स्टाफ़ के लिये, और फ़िर ७ बजे स्टुडेन्ट्स के लिये। मैने धीरे धीरे दुधारी सर से दोस्ती कर ली और स्टाफ़ शो के दौरान फिल्म रूम में जाना शुरु कर दिया। यहाँ से शायद पहली बार फिल्मों ने मुझे प्रभावित करना शुरु किया। हर फ़िल्म मैं दो बार देखता था। स्टाफ़ शो में दुधारी सर कोई सीन नही काटते थे लेकिन स्टुडेन्ट सो में उनकी हथेली लेन्स के आगे आ कर बॉयज़ को निराश करती। यहाँ सबसे मज़ेदार बात ये थी कि हर दो हिन्दी फ़िल्मों बाद एक इंगलिश फ़िल्म आती थी और उस उम्र और समाज़ के उस हिस्से में जहाँ से मैं आया था, ये एक्स्पोज़र ज़बर्दस्त था - ओमार द डेसर्ट लायन, द लास्ट एम्पेरर, कुनैन द बारबेरियन, कुनैन द डेस्ट्रोयर, से ले कर होम अलोन, वहाँ से सलाम बाम्बे जैसे पिक्चरों से ले कर के हार्डकोर बालीवुड जैसे नैना, रिशि कपूर की 'औरत नरक का द्वार है' वाले पिक्चर, दामिनी (जिसने मुझे हिला कर रख दिया था) से होते हुए डाई हार्ड, स्पीड जैसी ज़बरदस्त ऐक्शन फिल्मों तक का सफ़र मुझे बहुत उत्तेजित करता था। शायद जाने अन्जाने यहीं थियेटर के लिये लगाव पैदा हुआ। कभी कभी आप कुछ पसन्द करने लगते है, आपको पता भी नही होता कि उसका नाम क्या है - वही हुआ। बहुत बाद में पता लगा कि मैं थियेटर करना चाहने लगा था।

इसके बाद तमाम उथल पुथल हुई जीवन में, और फ़ाइनली, तमाम मिडिल क्लासी होनहारों की भाँति मैं भी दिल्ली चला गया - आई आई टी के तैयारी करने। मुझे दिल्ली बहुत भयावह मालूम पडती थी।एक ही शहर में एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिये एक से दो घन्टे लगना मुझे कभी अच्छा नहीं लगा। ऊपर से कोचिंगो की लूट खसोट, तैयारी के नाम पर अभिभावकों से पैसों के बंडल ऐंठ कर होस्टलों के नाम पर ऐसे बेस्मेंटों में स्टुडेन्टों को टिकाना जो गैरकानूनी होने के साथ साथ सीवर से लीक होते पानी के अनौपचारिक तालाब भी होते हैं। लिहाज़ा लीवर एन्लार्ज्मेण्ट, समथिंग क्लोज़ टू हेपेटाइटिस, से ग्रसित हो कर जल्द ही स्वास्थ लाभ के लिये वापस घर जाना पडा। दो महीने बिस्तर पर रहने के बाद वापस आने पर एक ही सहारा रह गया था, ये सहारा तीन अक्षरों का था - पी वी आर! इस सहारे में रोज़ दो से तीन घन्टे लगते थे, और कुछ महीनों के प्रयास पर इस सहारे ने एक पूरा सपोर्ट ग्रुप ही तैयार कर दिया था। जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ उन टिकटों की जो पी वी आर के दो फ़्रंट रो के होते थी और सरकार के आदेशानुसार सिर्फ़ सात रुपैये में मिलते थे, जिनके लिये लोग तीन तीन घन्टा पहले लाइन लगाते थे, और जिन्हें पाकर लगभग आई आई टी के सेलेक्शन जितनी खुशी पाते थे।

मेरा एक मित्र जो मेरे साथ आई आई टी की तैयारी करता था और आई आई टी में भी साथ था, कई वर्षों बाद मिला। उसने एक किस्सा बताया कि एक दिन मैने उसे तनाव मुक्ति के लिये नेशनल म्यूज़ियम घूमने और फ़िल्म देखने का मशविरा दिया और ये सात रुपैये वाला राज़ बताया। वो बेचारा टिकट लेने पहुँचा तो देखता है कि इतनी लम्बी लाइन है और उस पर भी हर कोई कह रहा है कि मेरे आगे १० है, मेरे आगे १५ हैं। मुझे ये कुछ जँचा नहीं, मैं अगली बार उसके साथ गया, तो मुझे देखते ही लाइन में आगे से दूसरे या तीसरे नंबर पर शामिल कर लिया गया और दोस्त के पूछने पर ये बताया गया कि ये पर्मानेन्ट लाइन में रहते हैं और जिन पन्द्र्ह की बात आपसे की थी, उनमें से ये एक हैं। मुझे वो दिन याद आया और ये भी याद आया कि उस दिन पहली बार लगा था कि शायद दिल्ली का कुछ हिस्सा मेरा भी है। माँ कसम, मैनें शायद ही तैयारी के दिनों में कोई भी पिक्चर छोडी हो। मैं बाकायदा फ़िजिक्स की किताब ले कर लाइन में दो से तीन घण्टा पहले लग कर पढाई भी करता रहता था और पढाई के लिये स्वयं को पुरस्कृत भी। सच है कि यदि पी वी आर ना होता तो मैं उतना कभी नहीं पढ पाता।

२००१ में मैने आई आई टी खडगपुर ज्वाइन किया। उस समय शायद ही किसी कालेज होस्टल में क्म्प्यूटर नेट्वर्क और इन्टरनेट की सुविधा हो। इस सुविधा और पियर टू पियर डाउनलोड नाम के अस्त्र के चलते मैं वर्ल्ड सिनेमा की बेहद पोषक डाइट पर पलने लगा। टोरेन्टिनों से मुलाकात हुई, गुड बैड अग्ली रूपी गुग्ली खायी, कास्ट अवे, ग्रीन माइल, फ़िलेडेल्फ़िया, और फ़ोरेस्ट गम्प ने दिमाग के परखच्चे उडा दिये, और पल्प फ़िक्शन ने मरहम लगाने के बजाय खून खच्चर कर डाला। जिस दिन वनेला स्काई देख कर रुलाई छूट गयी थी, उस दिन देखा कि मैं अकेला नहीं हूँ, सब के सब रो रहे थे। डेविल्स एड्वोकेट पर अपने रेस्पान्स को तो आज तक नहीं समझ पाया हूँ। फ़िर इस मिक्स्चर के ऊपर ७० के दशक के क्लासिक रॉक म्यूज़िक की गार्निशिंग हुई और एक जबर्दस्त चीज़ हाथ लगी - गाँजा। काफ़ी दिन तक फ़िल्म, म्यूज़िक, थियेटर और गाँजे के सेवन के बाद एक पिक्चर देखी - रेक्वीम फ़ॉर अ ड्रीम, इसी समय इश्क भी हो रहा था। इश्क और रेक्वीम बाकी सब पर भारी पडी और उसका नतीज़ा ये हुआ कि मुझे कॉलेज से निकाल कर फेंक नहीं दिया गया, बल्कि मैं बाइज़्ज़्त डिग्री ले कर पास हुआ। वैसे जिन मोहतरमा के चलते हम रास्ते पर आये, वो अक्सर बिलखते हुए फोन करतीं हैं, तो हम पूछ्ते है आज कौन सी देख ली!

हिंदी फ़िल्मों को दुख के साथ अंग्रेज़ी सिनेमा से अपने पर्सनल स्कोर बोर्ड पर हारते हुए देखते रहे, और एक दोस्त ने हृशीकेष मुखर्जी से परिचय करवाया। फ़िर कई दोपहरें होस्टल के कमरे में खूबसूरत, छोटी से बात, अंगूर देखते हुए बीतीं। रंग दे बसंती वो पहली फिल्म थी जिसने कोलकाता भेजा सिर्फ़ फ़िल्म देखने के उद्देश्य से - और शायद यहाँ से ही हिन्दी फ़िल्मों से आशा भी जगनी शुरु हुई। (लगान भी अच्छी लगी थी मगर महज़ एक स्टोरी की तरह, और उसके प्रोडक्शन के लिये ज़बरदस्त इज़्ज़त है मन में, लेकिन दिमाग में आग लगा दे ऐसा उसमें कुछ नहीं था।) इसके बाद सिर्फ़ वो ही फ़िल्में देखता था जिनसे आशा होती थी और सुपरस्टार फ़िल्मों से लगभग किनारा ही कर लिया था - कहीं ना कहीं ऐसा लगता था कि सुपर स्टार फ़िल्म का मतलब ही है कि ज़रूर बकवास होगी। उसके बाद ब्लैक देखी - सिनेमाटोग्राफ़ी पर वाह वाह कर उठे, लेकिन मूल रूप से अमिताभ के चरित्र से घृणा ही हुई क्योंकि वो मार पीट इत्यादि का सहारा लेते दिखाय गये थे, बल्कि गलोरिफ़ाई भी किये गये थे। लेकिन फ़िर भी कभी ना कभी कुछ ना कुछ मिलता रहा है हिन्दी फ़िल्मों से - सज्जनपुर, तारे ज़मीं पर, कमीने, ओमकारा जैसी फ़िल्में आती हैं, तो मन मचल उठता है देखने के लिये।

कुल मिला कर फ़िल्मों का जीवन पर बहुत असर पडा है, और कहीं ना कहीं ऐसी इच्छा है कि एक दिन कंधे पर कैमरा होगा और मेरा बनाया भी कोई देखेगा।

दस पसंदीदा हिन्दी फ़िल्में - रंग दे बसंती, तारे ज़मीं पर, मिली, छोटी सी बात, अंगूर, मुन्नाभाई, ओंमकारा, गाइड, नमकहलाल, दिल से और स्वदेश (शाहरुख के बावज़ूद)