chavanni chap (चवन्नी चैप)

maza aayega...padhte rahen

Saturday, July 4, 2009

दरअसल:दुविधा में संजय दत्त की आत्मकथा


-अजय ब्रह्मात्मज

चुनाव की सरगर्मी के बाद संजय दत्त ने नेता का चोला उतार दिया है। वे इन दिनों गोवा में अजय देवगन की फिल्म ऑल द बेस्ट की शूटिंग में बिजी हैं। इस दौरान उन्होंने खुद को आंका। कार्यो को निबटाया और दोस्तों के साथ बैठकें कीं। वे अजय को छोटे भाई मानते हैं। यही वजह है किफिल्म की योजना के मुताबिक उन्होंने एक शेड्यूल में शूटिंग खत्म की। सभी जानते हैं कि संजय की फिल्म उनकी उलझनों की वजह से खिंच जाती हैं।
संजय लगते एकाकी हैं, लेकिन उनका जीवन एकाकी हो ही नहीं सकता! उनके दोस्त उन्हें नहीं छोड़ते। शायद उन्हें भी दोस्तों की जरूरत रहती है। यह अलग बात है कि उनके दोस्त बदलते रहते हैं। उनके दोस्तों की सूची सीमित है। उनके कुछ स्थायी दोस्त हैं, जिनसे वे कभी-कभी ही मिलते हैं, लेकिन वे दोस्त ही उनके भावनात्मक संबल हैं। अपनी जिंदगी की उथल-पुथल में उन्होंने दोस्तों को परखा है। वे उन पर भरोसा करते हैं। संजय सरीखे व्यक्ति भावुक और अलग किस्म से संवेदनशील होने के कारण भरोसे में धोखा भी खाते हैं। वे ऐसे धोखों से कुछ नहीं सीखते। वे फिर भरोसा करते हैं। पिछले दिनों चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने देश के सुदूर इलाकों का दौरा किया। बिहार, उत्तर प्रदेश और बंगाल के पिछड़े क्षेत्रों में गए और वहां के लोगों की जिजीविषा से प्रभावित होकर लौटे। अपनी क्षणिक मुलाकातों में ही उन्हें लगा कि गांव के लोग छल-कपट नहीं जानते। वे सीधे और ईमानदार हैं। उन्होंने महसूस किया कि शहरों में रहते हुए हम देश की वास्तविकता से परिचित नहीं हो पाते। देश और समाज के बारे में उनके खयाल बदले हैं। वे देश की सेवा जिम्मेदारी के साथ करना चाहते हैं। गोवा में उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखने की इच्छा प्रकट की। उन्होंने कहा, मैं अपने जीवन के अनुभव और प्रसंग के बारे में लिखना चाहता हूं। लेखन में खुद की अक्षमता स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा, मैं किसी लेखकया पत्रकार के साथ मिलकर यह काम करना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि कोई मुझसे बात करे और मेरे शब्दों में सब कुछ लिखे। वे खुद से जुड़े प्रसंगों पर भी लिखना चाहते हैं, लेकिन मानते हैं कि दूसरों के बारे में साफ-साफ नहीं लिखा जा सकता, अगर पूरी तरह से सच्ची बात लिख दूंगा या बता दूंगा, तो दूसरों की मुश्किलें बढ़ जाएंगी। सवाल उठता है कि क्या ऐसा रक्षात्मक लेखन से उनके जीवन के बारे में लोग समझ पाएंगे?
संजय का जीवन सामान्य नहीं रहा है। उन्होंने कगार की जिंदगी जी है। अपनी भूल और नासमझ हरकतों से वे विवादों में उलझे। हालांकि उनका नाम बम कांड से अलग हो चुका है, लेकिन आ‌र्म्स एक्ट वाले मामले से वे मुक्त नहीं हुए हैं। निजी जिंदगी में उनके संबंध बनते-बिगड़ते रहे हैं। उनके प्रशंसक और फिल्म अध्येता उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना चाहते हैं। संजय पत्रकारों से खुलकर बात नहीं करते। अपने द्वंद्व और दुविधाओं की वजह से वे अपनी बातचीत में असहज और चौकस रहते हैं। कम बोलते हैं और उनकी बातें अस्पष्ट रहती हैं। ऐसे तिलिस्मी और रहस्यपूर्ण व्यक्ति की जीवनी या आत्मकथा निश्चित ही रोचक होगी। यदि वे ईमानदारी से अपनी मनोदशा, मानसिकता और अनुभव के बारे में विस्तार से लिखें, तो लोग उन्हें और उनके दौर को अच्छी तरह समझ पाएंगे।

Friday, July 3, 2009

फ़िल्म समीक्षा:कमबख्त इश्क




-अजय ब्रह्मात्मज

कोई शक नहीं कि निर्माता साजिद नाडियाडवाला पैसे खर्च करते हैं। वह अपने शौक और जुनून के लिए किसी हद तक जा सकते हैं। कमबख्त इश्क की शूटिंग हालीवुड के स्टूडियो में करनी हो या फिल्म में हालीवुड के एक्टर रखने हों, वह रत्ती भर भी नहीं हिचकते। अब यह अलग बात है कि उनके लेखक और निर्देशक हिंदी फिल्म के चालू फार्मूले में हालीवुड-बालीवुड की संगति नहीं बिठा पाते। यही वजह है कि फिल्म सारी भव्यता, नवीनता और खर्च के बावजूद चूं-चूं का मुरब्बा साबित होती है। सब्बीर खान के निर्देशन में बनी कमबख्त इश्क ऊंची दुकान, फीका पकवान का ताजा उदाहरण है।
फिल्म में अक्षय कुमार और करीना कपूर की जोड़ी है। दोनों हाट हैं और दोनों के चहेते प्रशंसकों की कमी नहीं है। प्रशंसक सिनेमाघरों में आते हैं और अपने पसंदीदा सितारों को कमजोर और अनगढ़ किरदारों में देख कर निराश लौटते हैं तो अपनी शर्मिदगी में किसी और को फिल्म के बारे में कुछ नहीं बताते। नतीजतन ऐसी फिल्में आरंभिक उत्साह तो जगाती हैं, लेकिन उसे जारी नहीं रख पातीं।
कमबख्त इश्क अक्षय कुमार और करीना कपूर की पुरानी फिल्म टशन से कंपीटिशन करती नजर आती है। निर्माता-निर्देशकों को समझ लेना चाहिए कि दर्शक ऐसी फिल्में स्वीकार नहीं करते। फिल्म की बुनियाद में पुरुष जाति और स्त्री जाति के प्रति परस्पर नफरत और हिकारत है। विराज (अक्षय कुमार) और सिमरिता (करीना कपूर) विपरीत लिंग के प्रति कोई सम्मान नहीं रखते। अपने जीवन के अनुभव और विश्वास से वे एक-दूसरे को हेय दृष्टि से देखते हैं। उनके बीच इतनी नफरत है कि वह धीरे-धीरे मुहब्बत में तब्दील हो जाती है। मुहब्बत का कोई लाजिक नहीं होता। इस फिल्म में स्थितियों, घटनाओं और प्रसंगों के साथ भावनाओं का भी कोई तर्क नहीं है। टुकड़ों में सोची गई यह फिल्म अंतिम प्रभाव में निहायत कमजोर साबित होती है।
अक्षय कुमार को विदूषक की भूमिका में हम कई फिल्मों में देख चुके हैं। निर्देशक उन्हें नई भावस्थिति नहीं देते। चूंकि पापुलर एक्टर को अपने सेफ जोन में खेलना अच्छा लगता है, इसलिए अक्षय कुमार भी नहीं समझ पाते कि उनकी एक जैसी भूमिकाओं और अदाओं से दर्शक ऊबने लगे हैं। करीना कपूर भी कुछ गानों और दृश्यों में सेक्सी दिखने के अलावा कोई प्रभाव नहीं छोड़ पातीं । फिल्म के नायक-नायिका के साथ बाकी किरदार भी आधे-अधूरे तरीके से गढ़े गए हैं।
हिंदी फिल्मों में 25-30 प्रतिशत संवाद अब अंग्रेजी में होने लगे हैं। गालियों और फूहड़ दृश्यों के उपयोग और सृजन में लेखक और निर्देशक अपनी भोंडी कल्पना का उपयोग करने लगे हैं। कमबख्त इश्क उसी की बानगी है। दोहराव और नकल फिल्म के संगीत में भी है। गाने कमबख्त इश्क के चल रहे होते हैं और कानों में किसी और फिल्म का पापुलर गीत सुनाई देता रहता है। संगीतकार अनु मलिक कहां से कहां पहुंच गए हैं?
रेटिंग : *1/2

Thursday, July 2, 2009

तस्वीरों में 'कमीने'
















विशाल भारद्वाज की फ़िल्म 'कमीने' की चर्चा अभी से हो रही है.चवन्नी के पाठकों के लिए कुछ तस्वीरें.क्या ये तस्वीरें कुछ कहती हैं?

Wednesday, July 1, 2009

मैं खुद को जागरुक मानती हूं:कटरीना कैफ



मैं खुद को जागरुक मानती हूं: कैटरीना डांसिंग डॉल और ग्लैमर गर्ल के नाम से मशहूर कैटरीना कैफ कबीर खान निर्देशित न्यूयॉर्क में माया का किरदार निभा रही हैं। यह भूमिका उनकी अभी तक निभायी गयी भूमिकाओं से इस मायने में अलग है कि फिल्म की कहानी सच को छूती हुई गुजरती है। उनके किरदार में भी वास्तविकता की छुअन है। बूम से हिंदी फिल्मों में आई कैटरीना कैफ ने अनी सुंदरता और अदाओं से खास पहचान बनायी है। वे पॉपुलर स्टार हैं, लेकिन अभी तक गंभीर और संवेदनशील भूमिकाएं उनसे दूर रही हैं। ऐसा लग रहा है कि न्यूयार्क की शुरूआत उन्हें नयी पहचान देगी।
आप फिल्म के किरदार माया से किस रूप और अर्थ में जुड़ाव महसूस करती हैं?
इस फिल्म का ऑफर मुझे कबीर खान ने दिया। उन्होंने मुझसे कहा कि अभी तक मैंने सभी फिल्मों में ग्लैमरस रोल निभाए हैं। मेरे सारे किरदार आम दर्शकों की पहुंच से बाहर रहे हैं किसी सपने की तरह। मैं माया के रूप में आपको ऐसी भूमिका दे रहा हूं जो दर्शकों के अड़ोस-पड़ोस की लड़की हो सकती है। उससे सभी जुड़ाव महसूस करेंगे। हो सकता है कालेज में आप ऐसी लड़की से मिली हों। एक ऐसी लड़की, तो अपनी सी लगे।
क्या आपने निजी जीवन में कभी आतंकवाद के प्रभाव को महसूस किया है?
नहीं, सीधे तो नहीं। ऐसी बहसों में शामिल रही हूं, जहां आतंकवाद की चर्चा चल रही हो। मुसलमानों को लेकर बात चल रही हो। अमेरिका में 9/11 के बाद मुसलमानों को लेकर जो आम धारणा बन गयी है। मेरे लिए मुसलमानों के प्रति बनी यह धारणा 9/11 ट्रेजडी से कम नहीं है। सही जानकारी नहंीं होने से यह धारणा बनी है।
क्या आप 9/11 के पहले और बाद की दुनिया में फर्क महसूस करती हैं?
पूरी दुनिया में तो नहीं, लेकिन अमेरिका में फर्क दिखता है। मैं तो वहां के राष्ट्रपति के रूप में ओबामा के चुनाव को उस फर्क का ही परिणाम मानती हूं। अमेरिका में अश्वेत राष्ट्रपति का चुनाव बड़ी घटना है। मुझे लगता है कि अमेरिका के नागरिक आतंकवादियों या कथित आतंकवादियों के प्रति अमेरिकी रवैए को समझते हैं।
क्या अमेरिका की यात्राओं में आप ने कभी एशियाई मूल के लोगों के प्रति मौजूद भेदभाव महसूस किया है?
नहीं ़ ़ ़व्यक्तिगत तौर पर नहीं। इसकी वजह यह हो सकती हैं कि मैं जवान लड़की हूं। मैं सिक्यूरिटी गार्ड को किसी पुरूष की तरह संभावित खतरा नहीं लगती होऊं।
आप हांगकांग में पैदा हुई। अमेरिका और लंदन में पली-बढ़ीं और अब भारत में काम कर रही हैं। क्या आप स्वयं को किसी विश्व नागरिक के रूप में देखती हैं?
इसके अलावा काम के सिलसिले में मैंने बीस से अधिक देशों की यात्राएं की हैं। उन देशों में लंबे समय तक रही हूं। मैं खुद को विश्व नागरिक कह सकती हूं। लेकिन एक बात कहूंगी कि मैं भारत आने पर महसूस करती हूं कि मैं यहीं की हूं। मैं सच कहती हूं, ब्रिटेन में रहते हुए मैंने खुद को वहां का महसूस नहीं किया। मुझे एशियाई ही समझा जाता रहा। मुझे लंदन में सौ प्रतिशत स्वीकृति नहीं मिली।
क्या आपके पास भारत का पासपोर्ट है?
इस बातचीत में यह सवाल गैरजरूरी है।
कोई बात नहीं। आप न्यूयॉर्क के डायरेक्टर कबीर खान के बारे में बताएं?
उन्हें अपनी पहली फिल्म के लिए नेशनल अवार्ड मिला। मैं उन्हें अत्यंत प्रतिभाशाली और संवेदनशील डायरेक्टर मानती हूं। वह मुसलमान समुदाय और इस्लाम के बारे में इतना जानते हैं। फिल्म शुरू करते समय मैंने उनसे पूछा था कि कहीं डाक्यूमेंट्री शैली में तो वे फिल्म नही बना रहे हैं। अगर ऐसा होगा तो मैं वैसी फिल्मों में यकीन नहीं करती। उन्होंने कहा कि इस फिल्म से सभी जुड़ाव महसूस करेंगे। इस फिल्म की प्रेम कहानी, इमोशन और ड्रामा में दर्शक रुचि लेंगे। इमोशन में हर जवान दर्शक को अपनी कहानी लगेगी, क्योंकि उनके भी दिल टूटे होंगे या उन्हें अपने प्यार का सिला नहीं मिला होगा। इंटरवल के बाद फिल्म की स्थितियां बदल जाती हैं, लेकिन वहां भी व्यक्त भावनात्मक तनाव परिचित लगेगा।
क्या आपने पिछले साल बनी खुदा के लिए देखी थी? न्यूयॉर्क उसी लाइन की फिल्म लगती है।
हां, मैंने वह फिल्म देखी है। बहुत अच्छी फिल्म है। न्यूयार्क उससे अलग है। यह प्यार, रिश्ते और दोस्ती की फिल्म है। 9/11 इसकी पृष्ठभूमि में है।
आप प्रकाश झा की राजनीति भी कर रही हैं। लगता है कि आप सीरियस फिल्मों की तरफ मुड़ रहीं हैं?
राजनीति सीरियस फिल्म नहीं है। उसमें नाटकीयता है ़ ़ ़ड्रामा है। पूरा मनोरंजन है उसमें। वह आज का महाभारत है। रिश्ते और मूल्यों की बातें हैं। जरूरी तो नहीं कि हर फिल्म फन फिल्म हो।
उस फिल्म में आपका किरदार देश की मशहूर नेता से मिलता-जुलता है। पहली बार आप साड़ी में दिखीं और आप के बाल पीछे की तरफ कर के काढ़े गए हैं। अपनी पापुलर छवि से अलग दिखीं हैं आप?
फिल्म में और भी बहुत कुछ है। आपने जो तस्वीरें देखीं, वे कुछ खास प्रसंगों की हैं। उस समय मैं राजनीति में आ चुकी हूं। अभी उस फिल्म के बारे में ज्यादा बातें करना सही नहीं होगा।
अपने छोटे से करिअर में आपने हर तरह की फिल्म कर ली। कैटरीना को अधिक मजा किस तरह की फिल्म में आता है?
मुझे थीम अच्छी लगे और स्क्रिप्ट मजबूत हो तो मुझे हर तरह की फिल्म अच्छी लगती है। डायरेक्टर सही फिल्म बना रहा हो और आप फिल्म से सहमत हों।
क्या इस तरह की बातें आप न्यूयॉर्क की तैयारी की वजह से कर पा रहीं हैं? या सामान्य तौर पर आप इतनी जागरूक हैं?
फिल्म करने की वजह से जानकारी बढ़ी। मैं खुद को जागरूक मानती हूं।

Tuesday, June 30, 2009

दो तस्वीरें:माई नेम इज खान में काजोल और शाहरुख़




यह फ़िल्म अभी बन रही है.करण जौहर अपने कलाकारों के साथ अमेरिका में इस फ़िल्म की शूटिंग कर रहे हैं.मन जा रहा है की करण पहली बार अपनी ज़मीन से अलग जाकर कुछ कर रहे हैं.हमें उम्मीद है कि काजोल और शाहरुख़ के साथ वे कुछ नया करेंगे...

Monday, June 29, 2009

हिन्दी टाकीज:तीन घंटे की फ़िल्म का नशा तीस दिनों तक रहता था-दुर्गेश उपाध्याय


हिन्दी टाकीज-४१

दुर्गेश में गंवई सहजता है। मालूम नहीं उन्होंने कैसे इसे बचा लिया है? बातचीत में हमेशा हँसी की चाशनी रहती है और चवन्नी ने कभी किसी की बुराई नहीं सुनी उनसे.ईर्ष्या होती है उनकी सादगी से...उनका परिचय उनके ही शब्दों में...नाम दुर्गेश उपाध्याय, पेशा- बीबीसी पत्रकार,मुंबई में कार्यरत..पढ़ाई लिखाई कुछ गांव में बाकी की लखनऊ में..लखनऊ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में मास्टर्स ..कैरिएर की शुरुआत मुंबई में की और पिछले कुछ सालों से फिल्मी और राजनैतिक पत्रकारिता में सक्रिय हैं..अच्छा खाना,बौद्दिक लोगों के साथ उठना बैठना,फिल्में देखना और पढ़ना खास शौक हैं..व्यक्तिगत तौर पर काफी भावुक हैं और गूढ विषयों जैसे ईश्वर का अस्तित्व,मानव विकास का इतिहास में गहरी दिलचस्पी,ओशो को पढ़ना पसंद है...
मेरा मानना है कि अपनी कहानी कहना हमेशा थोड़ा कठिन काम होता है।आपको लगता है कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया॥फिल्मी दुनिया में रिपोर्टिंग का मेरा अनुभव भले ही ज्यादा ना हो लेकिन इस दौरान काफी दिलचस्प अनुभव हुए हैं..मसलन अमिताभ बच्चन के साथ इंटरव्यू और बिना चिप लगी मशीन से प्रीति जिंटा का आधा इंटरव्यू करना और बाद में शर्मिंदगी झेलना..चलिए एक छोटी कोशिश करता हूं याद करने की...फिल्मों में अपने शौक की बात करुं तो ठीक से याद तो नहीं है लेकिन इतना कह सकता हूं कि जब से खुद को जाना है तब से फिल्मों की तरफ जबरदस्त रुझान है..मुझे अभी भी याद है कि किस तरह से पहली बार मैंने वीडियो पर नगीना फिल्म देखी थी और उसमें श्रीदेवी का वो नागिन बनना,आज भी जब वो दृश्य याद आता है तो मन में विचित्र तरह का भाव उभरता है..हम उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर जिले से आते हैं.वहां पर एक गांव है शेरपुर कलां.काफी नामी गांव है,इलाके में ही नहीं पूरे जिले में लोग इस गांव से परिचित हैं.वहीं पर मेरा जन्म हुआ..मेरे बाबा (दादा जी) और आजी ( दादी) वहीं पर रहते थे.मेरे पिता जी की नौकरी लखनऊ में होने की वजह से हमें गर्मियों की छुट्टियों में शहर आने का मौका मिलता था.
नब्बे के दशक की शुरुआत में टीवी ने गांवों की तरफ भी रुख करना शुरु कर दिया था।हमारे मोहल्ले में भी टीवी आया.उन दिनों टीवी के साथ एंटिना लगाने अनिवार्य होता था ताकि पिक्चर साफ आए.मुझे याद है कि किस तरह से हमारे एक पड़ोसी के घर जब बुश का छोटा टीवी सेट आया था और हम बांस की लंबी बल्ली में एंटिना टांगने के लिए मार पसीने से लथपथ हो गए थे.आखिरकार हम लंबी बल्ली में एंटिना टांगने में कामयाब रहे ये अलग बात है कि पिक्चर फिर भी साफ नहीं हो पायी॥
उन दिनों एक ही चैनल दूरदर्शन आया करता था और रविवार के दिन शाम को एक फिल्म आती थी॥हम सारे मोहल्ले के बच्चे जिनमें मेरे भाई बहन भी शामिल थे पूरे हफ्ते उस फिल्म का इंतजार करते थे..और आपको तो पता ही है गांवों में बिजली का हाल..फिल्म के बीच में जैसे ही लाइट जाती थी तो लगता था मानो किसी ने प्राण हर लिए हों..मैं तब छोटा था और सोचता था ये कौन है जो लाइट काटता है,अगर मुझे मिल जाए तो साले की गर्दन मरोड़ दूं।हमारे मोहल्ले में एक नंद कुमार नाम के व्यक्ति थे,बड़े ही बातूनी..हांलाकि पढ़े लिखे सज्जन थे लेकिन अगर एक बार बोलना शुरु कर दें तो अच्छे अच्छों को पानी पिला दें..उन्होंने अपनी पढ़ाई बीएचयू यानि बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से की थी और जनाब ने पढ़ाई के दौरान काफी फिल्में देखीं हुईं थी,वो अक्सर उन फिल्मों का जिक्र किया करते थे..उनमें से प्रमुख थी नील कमल और गाइड,,उन्हें इन फिल्मों के एक एक सीन बखूबी याद थे..जब वो वहीदा रहमान और देवानंद के बारे में चर्चा करना शुरु करते थे तो यकीन जानिए हमें भी लगता था कि कौन सा ऐसा दिन होगा जब हमें सितारों के दर्शन होंगे..नंद कुमार जी गाते भी थे,अब कैसा गाते थे ये नाही पूछिए तो बेहतर है..खैर,फिल्मों में मेरी दिलचस्पी वहीं से होनी शुरु हुई थी..
टीवी पर हमने काफी फिल्में देखीं।फिल्म देखने के लिए हमें जमीन पर और कई बार तो गंदगी के बीच बैठने में भी कोई ऐतराज नहीं होता था॥जब भी कोई हीरो या हिरोईन फिल्मों में गाना गाते थै तो हमें लगता था कि मैं भी बिल्कुल उसी अंदाज में कुछ कर रहा हूं.तीन घंटे की फिल्म देखने के बाद नशा तीस दिन तक रहता था..सन 1987 में मेरे लखनऊ वाले सरकारी मकान में पिता जी छोटा टीवी का सेट खरीद कर लाए थे उनदिनों रामायण आया करती थी,रविवार की सुबह नौ बजे ही हम नहा धोकर पूरा परिवार ये सीरियल देखता था,और बीच में मेरी मां खाने का भी इंतजाम कर देतीं थीं..वैसे यहां ये भी बता दूं कि फिल्मों में मेरी रूचि के पीछे मूल कारण मेरी मां ही रही हैं,उन्हें फिल्मों का जबरदस्त शौक रहा है और आज भी वो कोई भी फिल्म बड़े चाव से देखती हैं,हां ये बात अलग है कि बाद में इन फिल्मों में दिखाई जा रहे अंग प्रदर्शन को लेकर अपने गुस्से का इज़हार भी करती हैं
बचपन में ही मुझे मेरा दोस्त मिला॥हमारे गांव के बाहर एक स्कूल है जिसका नाम है निराला विद्या मंदिर..कक्षा 8 तक की पढ़ाई वहीं पर हुई..वहीं कक्षा 2 में मेरी दोस्ती उपेंद्र नाम के एक लड़के से हुई..वो भी अपने तरह का बिंदास लड़का था जिस पर क्लास की कुछ लड़कियां लट्टू थीं और गाना भी बेहतरीन गाता था..खूबसूरत था उसके होंठ बिल्कुल लाल थे,और पढ़ने में भी अच्छा था..उपेंद्र से मेरी जल्दी ही बनने लगी और मुझे याद है पहली बार वो मेरे घर बेर खाने के लिए आया था..मेरे घर के पिछवाड़े बेर का पेड़ था और उसे मैंने घर पर इसीलिए बुलाया था..फिर धीरे धीरे हमारी दोस्ती काफी गहरी होती गई..हम दोनों की दोस्ती के गहराने के पीछे एक मजबूत वजह जो बनी वो था मेरा फिल्मी ज्ञान..गर्मी की छुट्टियों में जब मैं लखनऊ जाता था और ढेर सारी फिल्में देखकर आता था तो क्लास के दौरान ही मैँ अपने कुछ दोस्तों का फिल्मों की कहानियां और डॉयलाग्स सुनाता था और वो मुझसे काफी प्रभावित रहते थे..वैसे मेरी क्लास में कुछ ऐसे भी लड़के थे जिन्हें फिल्मों में इतनी दिलचस्पी थी कि आसपास के इलाके में कहीं भी वीडियो आ जाए वो वहां पहुंचते ही पहुंचते थे..संदीप और लक्ष्मण का नाम मैं यहां लेना चाहूंगा..दोनों का ही जवाब नहीं था..वैसे उपेंद्र भी इसमें पीछे नहीं रहता था और कई बार तो मैं भी रात के अंधेरे में वीडियो देखने जाता था..मैं आपको बता नहीं सकता उस एहसास के बारे में जब वीडियो शुरु होता था और उसमें झिलमिल आवाजें आनी शुरु होंती थीं हम उत्साह से भर जाते थे..उपेंद्र की चर्चा थोड़ी और..उन दिनों फिल्मों के डॉयलाग्स की किताबें भी खूब बिकती थीं..उपेंद्र के पास इन किताबों का पिटारा था..उसका एक चेला था जिसका नाम था पेठा..जैसा नाम वैसा काम..पेठा जी,उपेंद्र के भक्त थे और उनके इशारे पर किताबों को इधर से उधर पहुंचाते थे..और कई बार लड़कियों की चिट्ठियां भी..हम क्लास में लड़कियों पर रुआब झाड़ने के लिए फिल्मी गाने भी खूब गाते थे..लेकिन मेरी छवि थोड़ी सी अलग थी और दुर्भाग्य से किसी लड़की का दिल मुझपे नहीं आ सका...लेकिन मेरा दोस्त लकी रहा...खैर,मुझे ये सौभाग्य हासिल था कि मैं इन किताबों को घर भी पढ़ने के लिए ले जाता था..क्लास में भी सबको पता था कि दुर्गेश और उपेंद्र की जमती है इसीलिए सब मेरी इज्जत भी करते थे क्यों कि उपेंद्र किसी को पीटने में जरा भी वक्त नहीं लगाता था और अकेला मैं ही था जिसकी किसी बात का वो बुरा नहीं मानता था..उसने मेरा हमेशा ख्याल रखा...और मेरे लिए भी वो हमेशा खास रहा..और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि हमने कक्षा 2 से ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई एक साथ की और आज भी तमाम थपेड़ों को सहते हुए हमारा रिश्ता बदस्तूर जारी है..हां इतना जरूर है कि समय के साथ साथ इसमें परिपक्वता जरुर आ गई है..लेकिन एक दूसरे से दोस्ती और लगाव उतना ही है...
नब्बे का दशक ऐसा रहा है जिसमें कई ऐसी फिल्में आईं जिनका संगीत लाजववाब था।खासकर ऐसी फिल्में जिनमें नदीम श्रवण का संगीत हो॥आशिकी,साजन वगैरह और कई नाम हैं लेकिन अभी ज़ेहन में नाम नहीं आरहा है.हमने ये सारी फिल्में वीडियो पर देखीं और आज भी जब ये फिल्में या इनका कोई गाना कहीं सुनाई देता है तो पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं...संजय दत्त को मैं उन्हीं दिनों से काफी पसंद करता हूं..उनकी फिल्में साजन,आतिश,खलनायक वगैरह ने दिमाग पर काफी असर छोड़ा..आज जब इन सितारों को नजदीक से मिलने और जानने का मौका मिला तो हंसी आती है अपनी उन दिनों के सोच पर..
वक्त के साथ सिनेमा बदल गया है॥लोगों का नजरिया बदल गया है,लेकिन एक बात जो नहीं बदली है वो फिल्मों की तरफ मेरा रुझान..बढ़ते हुए दिनों की तरह ही फिल्मों की तरफ मेरा झुकाव भी बढ़ता ही जा रहा है..
पसंदीदा फिल्में 11
1.नगीना
२.साजन
३.आशिकी
४.खलनायक
५.राम लखन
६.तारे ज़मीन पर
७.जो जीता वो ही सिकंदर
८.बाजीगर
९.दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे
१०.हम आपके हैं कौन
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Saturday, June 27, 2009

फ़िल्म समीक्षा:न्यूयार्क

-अजय ब्रह्मात्मज
कबीर खान सजग फिल्मकार हैं। पहले काबुल एक्सप्रेस और अब न्यूयार्क में उन्होंने आतंकवाद के प्रभाव और पृष्ठभूमि में कुछ व्यक्तियों की कथा बुनी है। हर बड़ी घटना-दुर्घटना कुछ व्यक्तियों की जिंदगी को गहरे रूप में प्रभावित करती है। न्यूयार्क में 9/11 की पृष्ठभूमि और घटना है। इस हादसे की पृष्ठभूमि में हम कुछ किरदारों की बदलती जिंदगी की मुश्किलों को देखते हैं।
उमर (नील नितिन मुकेश) पहली बार न्यूयार्क पहुंचता है। वहां उसकी मुलाकात पहले माया (कैटरीना कैफ) और फिर सैम (जान अब्राहम) से होती है। तीनों की दोस्ती में दो प्रेम कहानियां चलती हैं। उमर को लगता है कि माया उससे प्रेम करती है, जबकि माया का प्रेम सैम के प्रति जाहिर होता है। हिंदी फिल्मों की ऐसी स्थितियों में दूसरा हीरो त्याग की मूर्ति बन जाता है। यहां भी वही होता है, लेकिन बीच में थोड़ा एक्शन और आतंकवाद आता है। आतंकवाद की वजह से फिल्म का निर्वाह बदल जाता है। स्पष्ट है कि उमर और सैम यानी समीर मजहब से मुसलमान हैं। उन पर अमेरिका की खुफिया एजेंसी एफबीआई को शक होता है। कहते हैं 9/11 के बाद अमेरिका में 1,200 मुसलमानों को शक के घेरे में लिया गया। समीर उनमें से एक है। नौ महीने की हिरासत में पुलिस यातना सहने के बाद वह मुक्त होता है तो उसके दिल में एफबीआई के लिए घोर नफरत है। एफबीआई को उस पर फिर से शक है, लेकिन इस बार वह समीर के दोस्त उमर को अपना एजेंट बना लेती है। पक्के सुबूत के लिए उमर का इस्तेमाल किया जाता है। एफबीआई में मुसलमान अधिकारी रोशन है, जो 9/11 के बाद मुसलमानों के प्रति फैले रोष और संदेह को मिटाना चाहता है। उसका मानना है कि इसके लिए मुसलमानों को आगे आना होगा।
दोस्ती, प्यार, रिश्ते और इज्जत जैसी भावनाओं को घोल कर न्यूयार्क तैयार की गई है। ऊपरी तौर पर रियलिस्टक और हार्ड हिटिंग लग रही यह फिल्म हिंदी फिल्मों के फार्मूले से बाहर नहीं निकल पाती। कबीर खान कहीं न कहीं यशराज फिल्म्स के प्रचलित ढांचे में खुद को ढालते नजर आते हैं। प्रसंग और स्थितियां वास्तविक होने के बावजूद गहराई से इसलिए नहीं छू पातीं क्योंकि उनमें बनावटीपन दिखाई पड़ता है। कबीर की छटपटाहट दिखाई पड़ती है। वह प्रचलित ढांचे से बार-बार निकलने की कोशिश करते हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि उनकी कोशिशों को कतर दिया जा रहा है।
कबीर खान ने अमेरिकी समाज के सोच और राजनीति की आलोचना की है, लेकिन उस धारणा को ही रेखांकित किया है कि अमेरिकी समाज में हर नागरिक को मौलिक स्वतंत्रता हासिल है। 9/11 के बाद भी आतंकवाद के संदेह में आए मुसलमान व्यक्तियों का मामला एक मुसलमान अधिकारी को सौंपा जाता है। एक मुसलमान, आतंकवादी के बेटे को अमेरिकी समाज अपना हीरो बनाने को तैयार है। अमेरिका के इस स्वच्छ, लोकतांत्रिक और आदर्शवादी सोच को लेकर कई सवाल मन में उठते हैं। न्यूयार्क अमेरिका के प्रति भरोसा रखने और जगाने का प्रयास करती है।
कलाकारों की बात करें तो पहली बार ग्लैमरहीन भूमिका में कैटरीना कैफ दिखी हैं। कुछ दृश्यों में वे जंचती हैं तो कुछ में संघर्ष करती नजर आती हैं। कबीर खान ने माया की भूमिका सिर्फ उत्प्रेरक की रखी है। वह कारक नहीं है। फिल्म मुख्य रूप से नील नितिन मुकेश, जान अब्राहम और इरफान खान की है। इरफान दिए गए दृश्यों में ही अभिनय के पल चुरा लेते हैं। हां, नील नितिन मुकेश फिर से साबित करते हैं कि अगर उन्हें सही चरित्र मिले तो वह निराश नहीं करेंगे। जान अब्राहम के अभिनय में अपेक्षाकृत विकास है। यातना और रोष के दृश्यों में वे अपनी सीमित भंगिमाओं से बाहर आते हैं। फिल्म में गीत-संगीत लगभग अप्रासंगिक है। न्यूयार्क को फिल्माने में निर्देशक ने कैमरामैन का सही उपयोग किया है। फिल्म इस लिहाज से उल्लेखनीय है कि यह हिंदी फिल्मों के प्रचलित ढांचे में रहते हुए इश्क-मुहब्बत से परे जाकर रिश्तों और राजनीति की बात करती है।
रेटिंग : ***

Friday, June 26, 2009

दरअसल:कई परतें थीं बाबू मोशाय संबोधन में

-अजय ब्रह्मात्मज
अमिताभ बच्चन के सुपर स्टार बनने से पहले के सुपर स्टार भी मकाऊ में आयोजित आईफा अवार्ड समारोह में उपस्थित थे। फिल्म इंडस्ट्री में उनके योगदान को रेखांकित करते हुए सम्मानित किया गया। उन्होंने भगवा रंग के कपड़े पहन रखे थे। चाल में पहले जैसी चपलता नहीं थी, लेकिन कदम डगमगा भी नहीं रहे थे। वे बड़े आराम और सधे पांव से मंच पर चढ़े। सम्मान में मिली ट्राफी ग्रहण की, फिर अमिताभ बच्चन को बाबू मोशाय संबोधित करते हुए अपनी बात कही। मकाऊ में आयोजित आईफा अवार्ड समारोह में हम सुपर स्टार राजेश खन्ना को सुन रहे थे।
अपने अभिभाषण में उन्होंने एक बार भी अमिताभ बच्चन के नाम से संबोधित नहीं किया। बाबू मोशाय ही कहते रहे। अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना की फिल्म आनंद देख चुके दर्शकों को अच्छी तरह याद होगा कि इस फिल्म में अमिताभ बच्चन को राजेश खन्ना बाबू मोशाय ही कहते हैं। मकाऊ में मंच पर राजेश खन्ना के बाबू मोशाय संबोधन में लाड़, प्यार, दुलार, शिकायत, आशंका, प्रशंसा, मनमुटाव, अपेक्षा, उपेक्षा आदि भाव थे।
हर दो पंक्ति के बाद बाबू मोशाय को अलग अंदाज में उच्चरित कर राजेश खन्ना कुछ नया जोड़ते रहे। थोड़ा पीछे हटकर उनकी तरफ देखते हुए अमिताभ बच्चन के चेहरे पर हर बाबू मोशाय उच्चारण के बाद एक नए रंग की लहर दौड़ जाती थी। जो सभी ने सुना और समझा, राजेश खन्ना उससे कुछ ज्यादा कह रहे थे और पूरा यकीन है कि अमिताभ बच्चन उनके हर शब्द और उच्चारण के भेद और मर्म को समझ रहे थे। राजेश खन्ना ने स्पष्ट कहा कि वह भी एक दौर था, यह भी एक दौर है। पहले कोई और था, आज कोई और है..। राजेश खन्ना जिस तरफ इशारा कर रहे थे या मुट्ठी से फिसल चुकी लोकप्रियता को याद कर कसमसा रहे थे, उसे सभी ने देखा और समझा। ऐसे द्वंद्व और दंश से अधिक सहानुभूति नहीं हो पाती, क्योंकि बदलते वक्त के साथ हर शय बदलती है। हालांकि अमिताभ बच्चन ने अपने परिचय में राजेश खन्ना की अप्रतिम लोकप्रियता का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि कैसे उनकी कार के टायर की धूल को लड़कियां अपनी मांगों में भरती थीं.., राजेश खन्ना जैसी लोकप्रियता कभी देव आनंद ने भी देखी थी। कहते हैं राजेश खन्ना की पलकें झपकती थीं, तो लड़कियां सिनेमाघरों में सीटों पर उछल पड़ती थीं। समय ने वह लोकप्रियता किसी और को दे दी है। अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना ने दो फिल्मों आनंद और नमक हराम में साथ काम किया। यह वही दौर था, जब एक स्टार का अस्त हो रहा था और दूसरे का उदय..।
आईफा अवार्ड में हर साल इस विशेष पुरस्कार से अपनी बिरादरी के किसी समकालीन या सीनियर कलाकार को सम्मानित करने के बाद अमिताभ बच्चन को ताने सुनने पड़ते हैं। फिरोज खान और धर्मेद्र ने भी अपने संबोधनों में शिकायतें रखी थीं। शायद यह अमिताभ बच्चन की लंबी पारी का साइड इफेक्ट हो! दूसरों को अपनी असफलता खलती है, लेकिन उसकी वजह जरूरी तो नहीं कि अमिताभ बच्चन ही हों। राजेश खन्ना ने अपने संबोधन में अमिताभ बच्चन से इशारे में कई सवाल किए। जाहिर है, हमें उम्मीद होगी ही कि वे अपने ब्लॉग पर इस प्रसंग और राजेश खन्ना के संबोधन के बारे में कुछ लिखें! तब शायद कुछ नए भेद खुलें। परतों से धूल छंटे और हम सब स्टारों के संबंधों को नए सिरे से समझें!

Wednesday, June 24, 2009

दर्शनीय फ़िल्म:झनक झनक पायल बाजे

दर्शनीय फ़िल्म-२
-आनंद भारती
झनक झनक पायल बाजे
अवधी-१४३ मिनट
विधा-म्यूजिकल ड्रामा

वी शांताराम भारत के उन फिल्‍मकारों की श्रेणी में हैं, जिनकी फिल्‍मों ने हमेशा सामाजिक संदेश दिए। वह चाहे 'आदमी' हो या 'पड़ोसी', 'दहेज' हो या 'दु‍निया न माने' या फिर 'अमृत मंथन' हो या 'अमर ज्‍योति' और 'नवरंग'। उनकी फिल्‍मों में अप‍राधियों का हृदय परिवर्तन होता है, वेश्‍याओं का पुनर्वसन होता है, सांप्रदायिक सद्भाव का माहौल तैयार होता है, दहेज-प्रथा बेनकाब होती है। वी शांताराम वैसे भाग्‍यशाली फिल्‍मकार रहे, जिन्‍होंने जीते जी अपनी अमरता का स्‍वाद चख लिया। उनकी सारी फिल्‍में हिट रहीं और हर फिल्‍म को मील का पत्‍थर माना जाता है।
ऐसी ही फिल्‍मों में एक फिल्‍म थी 'झनक झनक पायल बाजे'। 1955 में बनी यह फिल्‍म हालांकि कहानी की दृष्टि से कुछ कमजोर थी, मगर संगीत-नृत्‍य इसकी जान थी। सुप्रसिद्ध र्नतक गोपीकृष्‍ण के जीवन की यह एक अद्भुत फिल्‍म बन गई। वह प्रमुख भूमिका में थे। इस फिल्‍म को न केवल सर्वश्रेष्‍ठ फिल्‍म, सर्वोत्तम निर्देशन तथा सर्वोत्तम कला निर्देशन का फिल्‍मफेयर अवार्ड मिला, बल्कि राष्‍ट्रपति का रजत पुरस्‍कार भी हासिल हुआ।
शांताराम की हर फिल्‍म उनकी ड्रीम प्रोजेक्‍ट होती थी, मगर 'झनक झनक पायल बाजे' के निर्माण के समय सफलता, विफलता का जो भय मन में सवार हो गया था, वह रिलीज होने के बाद ही दूर हुआ। तब उन्‍होंने कहा था, 'इस फिल्‍म का निमार्ण मेरा स्‍वप्‍न था, जिसे मैंने तन, मन, धन को पूरी तरह दांव पर लगाकर पूरा किया। अगर यह दर्शकों को पसंद नहीं आती तो मैं पूरी तरह बर्बाद हो गया होता।' इसकी सफलता को इस रूप में भी आंका जा सकता है कि मुंबई के मेट्रो सिनेमाघर में लगने वाली यह पहली हिंदी फिल्‍म थी।
इस फिल्‍म को शांताराम ने टेक्‍नीकलर में बनाने की योजना पहले ही तैयार कर ली थी। लेकिन इसके लिए काफी पैसे चाहिए थे। उस चुनौती को उन्‍होंने स्‍वीकार किया तथा इसके लिए पूरे उपकरण विदेशों से मंगवाकर अपने स्‍टूडियो में लगवाए थे। मगर तकनीशियन सभी भारतीय ही थे, जिन्‍होंने अपने परिश्रम और प्रतिभा से इस फिल्‍म को आश्‍चर्यजनक बना दिया। इसी फिल्‍म से नृत्‍य निर्देशक नामक तत्‍व का भी जन्‍म हुआ। इसके पहले उनकी कोई पहचान नहीं बनी थी। जी बालकृष्‍ण ने अपने कैमरे के सारे प्रयोग कर दिखाए। नृत्‍य निर्देशक स्‍वयं गोपीकृष्‍ण थे। पटकथा और संवाद दीवान शरर ने लिखे थे। गीत हसरत जयपुरी के थे तथा संगीत दिया था वसंत देसाई ने। कला निर्देशन किया था कनु देसाई ने। संपादक थे चिंतामन बोरकर, कलाकार थे - गोपीकृष्‍ण, संध्‍या, के दाते, मदन पुरी, मनोरमा, चंद्रकांत, मुमताज बेगम, चौबे महाराज, नाना पलसीकर, निवालकर, चमन पुरी और भगवान। राजकमल कला मंदिर की इस फिल्‍म के निर्देशक वी शांताराम थे।
इस फिल्‍म को आज भी भारतीय कला और संस्‍कृति के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इसकी कहानी भगवान शंकर के दरबार से शुरू होती है, जहां 'भरत नटराज' की सर्वोच्‍च उपाधि के प्रयास होते हैं। इसलिए कि शंकर को नृत्‍य कला का अधिष्‍ठाता माना गया है। यानी नटेश्‍वर हैं वह। मंगल महारा (के दाते) को 'भरत नटराज' की उपाधि हासिल है। यह उनके वंश की परंपरा बन गई है कि भारत के इस शीर्ष पुरस्‍कार को प्राप्‍त करें। चूंकि वह बूढ़े हो गए हैं, इसलिए उनकी इच्‍छा और सपना है कि इस उपाधि को उनका लड़का गिरधर (गोपीकृष्‍ण) धारण करे। वह अपने बेटे को उस योग्‍य बनाने लगते हैं। लेकिन मंगल महाराज की यह समस्‍या है कि वह कठोर अनुशासन में विश्‍वास करते हैं तथा विचार के स्‍तर पर पुरातनपंथी हैं। कला-साधना के बीच न तो हल्‍केपन को बर्दाश्‍त करते हैं और न ही गलतियों को।
गिरधर भी पिता की तरह तेजस्‍वी नर्तक हैं। एक दिन वह भी नीला (संध्‍या) नामक युवती को सस्‍ते और उत्तेजक नृत्‍य करते हुए देख लेते हैं। गिरधर इसके लिए नीला को डांटते भी हैं। मगर नीला बहुत अहंकारी लड़की है। वह गिरधर से नृत्‍य पर बहस कर बैठती हैं। गिरधर उन्‍हें जब नृत्‍य के कुछ भाव दिखाते हैं तो नीला को मान होता है कि उन्‍हें तो बहुत कुछ सीखना बाकी है। यहीं गिरधर की योग्‍यता में नीला की जिज्ञासा का प्रवेश हो जाता है। यानी एक रोमांटिक ट्रैक तैयार हो जाता है। नीला तब मंगल महाराज से प्रार्थना करती है कि वे उन्‍हें अपनी शिष्‍या बना लें। मंगल महाराज की साधना और साधक की कठोरता संबंधी सारी शर्तों को वह मान लेती हैं। मंगल महाराज उनके समर्पण और दृढ़ता को देखकर 'भरत नटराज' की प्रतियोगिता में गिरधर की नृत्‍य-सहयोगी बनने की स्‍वीकृति भी दे देते हैं।
गिरधर और नीला-दोनों की साधना के बीच प्रेम पनपने लगता है, जबकि मंगल महाराज के वंश में साधना के दौरान प्रेम के प्रवेश को हमेशा वर्जित माना जाता रहा है। भरत नटराज की उपाधि के बाद ही विवाह का अधिकार दिया जाता है। गिरधर उस मान्‍य परंपरा के खिलाफ खड़े होते दिख रहे हैं। इस बीच उस कहानी में मनी बाबू (मदन पूरी) यानी खलनायक का प्रवेश होता है। मनी बाबू काफी पैसे वाला है, जो नीला को मन ही मन प्‍यार करता है। नीला और गिरधर का साथ उसे परेशान करता रहता है। वह मंगल महाराज के कान भरने में सफल हो जाता है। मंगल महाराज छड़ी फेंकते हैं, जिससे गिरधर जख्‍मी हो जाते हैं। गिरधर के चेहरे पर दुख और पीड़ा के भाव उभरते हें, जिसे मंगल महाराज देखकर द्रवित हो जाते हैं। वह ईश्‍वर से अपने लिए क्षमा तथा गिरधर के लिए कला के प्रति सच्‍ची लगन पैदा करने का वरदान मांगते हैं। लेकिन गिरधर धीरे-धीरे नीला के मोहजाल में धंसते चले जाते हैं। इससे उनकी साधना में गतिरोध आने लग जाता है।
इस बीच मंगल महाराज महाशिव रात्रि के उत्‍सव में भाग लेने वाराणसी चले जाते हैं। लौटने पर पाते हैं कि दोनों साधना की बजाए प्रेमालाप में लीन हो गए हैं। तब वह वाराणसी से लाए घुंघरू और परंपरा से मौजूद वस्‍त्र को देकर गिरधर को वंश के सम्‍मान की रक्षा की याद दिलाते हैं। वह आग्रह करते हैं कि एक लड़की के प्‍यार के चक्‍कर में पड़कर अपने कर्तव्‍य को भूलने की कोशिश मत करो। उनके समझाने का कोई असर नहीं होता है। वह एक दिन दोनों को रोमांटिक मूड में देख लेते हैं। तब मंगल महाराज चतुराई से काम लेते हुए विश्‍वामित्र और मेनका प्रसंग पर नृत्‍य की तैयारी कराते हैं कि किस तरह मेनका ने विश्‍वामित्र की वर्षों की तपस्‍या को भंग कर दी थी। तब नीला को समझ में आता है कि उन्‍हें इंगित करके ही यह नाट्य तैयार कराया गया है। गिरधर पिता की इस रणनीति का विरोध करते हैं, जबकि नीला सोचने लगती है कि उनके कारण ही गिरधर की साधना भंग हो रही है। गिरधर के मन में नफरत पैदा करने के लिए नीला अचानक मनी बाबू के साथ चली जाती हैं। फिर वह उन्‍हें छोड़कर नदी में कूद जाती हैं। लेकिन भाग्‍य से एक साधु (नाना पलसीकर) बचा लेते हैं। मंगल महाराज, गिरधर को लेकर कहीं और चले जाते हैं। वह अपनी भूतपूर्व शिष्‍या रूपकला (चंद्रकला) को उत्‍सव में साथ नृत्‍य करने के लिए तैयार करते हैं। इस बीच नीला को उनकी नौकारानी देख लेती है। मनी बाबू भी उन्‍हें ढूंढ़ लेते हैं। मगर नीला का प्रण है कि जब तक गिरधर 'भरत महाराज' की उपाधि नहीं पा जाते, तब तक कोई भी फैसला अपने बारे में नहीं कर सकतीं। मनी बाबू भी कसम लेता है कि गिरधर को कभी भी वह उपाधि नहीं लेने देगा।
समय का चक्र ऐसा चलता है कि गिरधर की मुलाकात नीला से हो जाती है। वह नीला को साथ चलने के लिए कहते हैं। जब वह तैयार नहीं होतीं तो गिरधर उनकी हत्‍या पर उतर आते हैं। तभी मंगल महाराज वहां पहुंच जाते हैं। नीला वहां से चली जाती हैं।
काफी समय बाद 'भरत नटराज' उत्‍सव का दृश्‍य आता है। एकल नृत्‍य में गिरधर सबको पराजित कर देते हैं। लेकिन अंतिम दिन गिरधर को रूपकला के साथ तांडव नृत्‍य करना है। मनी बाबू अपनी चाल के तहत रूपकला को लालच देकर फोड़ लेता है। वह भाग जाती हैं। गिरधर परेशान हो जाते हैं। तभी नीला मंच पर उपस्थित होती हैं। गिरधर का क्रोध और बढ़ जाता है। वह त्रिशूल से उन पर हमला कर देते हैं। त्रिशूल को मंगल महाराज अपने हाथ पर झेल लेते हैं। हाथ लहूलुहान हो जाता है। नीला पर आया गुस्‍सा, तांडव में बदल जाता है। गिरधर 'भरत महाराज' की उपाधि के हकदार बन जाते हैं। मनी बाबू अपनी हार स्‍वीकार कर लेता है तथा मंगल महाराज नीला का हाथ मांगकर गिरधर के हाथों में पकड़ा देते हैं। फिल्‍म यहीं खत्‍म हो जाती है। भारत की कलात्‍मक फिल्‍मों में इसकी गिनती शीर्ष पर की जाती है।
गोपीकृष्‍ण ने अपनी वास्‍तविक नृत्‍य-प्रतिभा का जमकर प्रदर्शन किया, जो दर्शकों को आज भी याद है। नृत्‍य की अधिकांश शूटिंग मैसूर के वृंदावन गार्डन में की गई थी। जी बालकृष्‍ण की फोटोग्राफी ने प्रकृति और नृत्‍य के सौंदर्य को बखूबी कैद किया था। बालकृष्‍ण भारत के पहले सिनेमेटोग्राफर हैं, जिन्‍हें टेक्‍नीकलर में छायांकन करने का गौरव प्राप्‍त हुआ।
फिल्‍म में ग्‍यारह गीत हैं। सात गीत हसरत जयपुरी के हैं, जबकि दो गीत दीवान शरर ने लिखे हैं। एक गीत के रचियता सरस्‍वती कुमार दीपक हैं, जबकि एक मीराबाई का गीत लिया गया है। सच तो यह है कि इस फिल्‍म को सुपरहिट करने में गीत-संगीत ने जबर्दस्‍त भूमिका निभाई थी। 'नैन सो नैन नाहि मिलाओ...' और 'सैयां जाओ जाओ मोसे ना बोलो...' अमर गीतों में शामिल हो चुके हैं।
वर्ष -१९५५
निर्माण-राज कला मन्दिर
निर्देशक-वी शांताराम
कथा -संवाद-दीवान शरण
गीत-हसरत जयपुरी
संगीत-वसंत देसाई
नृत्य निर्देशक-गोपी कृष्ण
कलाकार-गोपी कृष्ण,संध्या,मदन पुरी,भगवान,मनोरमा,मुमताज़ बेगम, नाना पलसीकर
पुरस्कार
श्रेष्ठ निर्देशक-वी शांताराम
श्रेष्ठ कला निर्देशक-कानू देसाई
श्रेष्ठ फ़िल्म-वी शांताराम
श्रेष्ठ साउंड recordist -a k parmar

Monday, June 22, 2009

फिल्म समीक्षा:लेट अस डांस और पेइंग गेस्ट


-अजय ब्रह्मात्मज

सीमाओं में भी दिखती है संभावना- लेट अस डांस

आरिफ शेख की फिल्म लेट अस डांस इस मायने में प्रशंसनीय है कि पहली फिल्म होने के बावजूद उन्होंने घिसी-पिटी प्रेम कहानी नहीं चुनी। उन्होंने डांसर सुहानी के माध्यम से कुछ कर गुजरने की जिद को अच्छी तरह चित्रित किया है। फिल्म की कमजोरियां पटकथा, सेट और निर्माण में दिखती हैं। अगर निर्देशक को मजबूत समर्थन मिलता और वह पटकथा पर थोड़ा ध्यान देते तो लेट अस डांस खूबसूरत म्यूजिकल बन जाती।
सुहानी डांसर है। वह डांस स्कूल भी चलाती है। वहां वह समाज के वंचित, सड़क छाप बच्चों को डांस की ट्रेनिंग देती है। उसकी एक ही इच्छा है कि ये बच्चे डांस करें और अपनी कला का प्रदर्शन सही मंच से करें। उसका अपना भी संघर्ष है। दोनों संघर्ष विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। सुहानी किसी तरह अपने सपने साकार करने के करीब पहुंचती है तो उसे गहरा भावनात्मक और पेशागत झटका लगता है। आभास होता है कि सब कुछ बिखर गया। फिर भी वह हिम्मत नहीं हारती। नए सिरे से कोशिश करती है और आखिरकार कामयाब होती है।
सुहानी की भूमिका में गायत्री पटेल जंचती हैं। वह अच्छी डांसर हैं। नृत्य में उनकी भाव मुद्राएं और गति आकर्षित करती हैं। समान्य कद-काठी की गायत्री का सौंदर्य उनके डांसिंग स्टेप्स में दिखता है। नाटकीय और भावनात्मक दृश्यों को वह निभा ले जाती हैं। पटकथा की कमजोरी से बाकी चरित्रों का गठन नहीं हो पाया है। इस वजह से वे किरदार और उन्हें निभा रहे कलाकार कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाते। किशोर उम्र के टपोरी की भूमिका निभा रहे बाल कलाकार के अभिनय में सहजता है। प्रेम कहानी पर फोकस नहीं था तो उसके ट्रैक की क्या जरूरत थी?
इस फिल्म में गीत, संगीत और कोरियोग्राफी महत्वपूर्ण है। कोरियोग्राफर ने नए स्टेप्स दिए हैं, लेकिन गीत-संगीत प्रभावशाली नहीं है। फिल्म की धुनें और बोल याद नहीं रह पाते। अंत में इतना कहा जा सकता है कि आरिफ शेख अपनी पहली फिल्म में अनेक सीमाओं के बावजूद संभावनाएं जाहिर करते हैं।
रेटिंग : **

कामेडी कम, कंफ्यूजन ज्यादा- पेइंग गेस्ट

बड़ा नाम सुना था परितोष पेंटर का। मुंबई के रंगमंच के चिर-परिचित परितोष की फिल्म पेइंग गेस्ट से उस नाम के अनुरूप ही उम्मीद थी। उम्मीद तो टूटी ही, फिल्म देखकर घोर निराशा हुई और अफसोस हुआ कि सुभाष घई की प्रोडक्शन टीम को क्या हो गया है? उनकी टीम अच्छी स्क्रिप्ट क्यों नहीं चुन पा रही है?
आवास की समस्या से परेशान युवकों में से दो लड़की का रूप धारण कर दंपती बन जाते हैं और एक मकान में रहने लगते हैं। आवास की यह समस्या हम गोलमाल और गोलमाल रिट‌र्न्स में ज्यादा मनोरंजक अंदाज में देख चुके हैं। और फिर नए लड़कों के बीच जावेद जाफरी पूरी तरह मिसफिट लगते हैं। हंसाने का जानी लीवर का घिसा-पिटा तरीका अब ऊब पैदा करता है। असरानी और पेंटल को हमारे निर्देशक कुछ नया दे ही नहीं पाते। गौरतलब है कि पेंटल एफटीआईआई में अभिनय के शिक्षक हैं।
पूरी फिल्म बैंकाक में शूट की गई है। पृष्ठभूमि की आधुनिक भव्यता तभी सुंदर लगती है, जब सामने चल रहा ड्रामा दर्शनीय हो। पेइंग गेस्ट में कामेडी कम, कंफ्यूजन ज्यादा है।
रेटिंग :*